Wednesday, 13 May 2020

क्या था Y2K संकट? आइए जानते हैं।

आज भले ही पूरी दुनिया में संचार क्रांति आ चुकी हो। विशाल कम्प्यूटर अपना रूप बदलकर जेब में समा चुके हो, लेकिन इस सदी की शुरुआत में हालात ऐसे नहीं थे। कहा तो ये भी जा रहा था कि पूरी दुनिया से कम्प्यूटर खत्म हो जाएंगे। संचार तंत्र प्रभावित हो जाएगा कारण था Y2K बग।
ये वो दौर था जब पूरा संसार 20वीं सदी से 21वीं सदी में प्रवेश कर रहा था। सन 1999 खत्म होकर 2000 की शुरूआत होने वाली थी, लेकिन दुनियाभर के कम्प्यूटर सिस्टम 31 दिसंबर, 1999 से आगे का साल बदल पाने में सक्षम नहीं थे। यह समस्या केवल तब तक रही, जब तक भारतीय कम्प्यूटर इंजीनियर्स ने ऐसे कम्प्यूटरों को 21वीं सदी का बनाकर नहीं छोड़ा। शायद पीएम मोदी भारतीयों की इसी कड़ी मेहनत और परिश्रम का उदाहरण दुनिया के सामने रखना चाहते थे।

नहीं बदलती 31 दिसम्बर 1999 के बाद तारीख!
दरअसल जब साल 1999 खत्म हुआ तो उस समय कम्प्यूटर डिफॉल्ट रूप से अगले साल को 1900 करने वाला था और यदि ऐसा हो जाता तो दुनियाभर की सभी गणनाएं गलत हो जातीं। साल 2000 की शुरुआत में संख्या को लेकर कंप्यूटर के कैलेंडर और स्टोरेज में आई समस्या को Y2K संकट कहा गया। Y2k में y का मतलब year (ईयर), 2 को मतलब दो और k का मतलब हजार है यानी 2000। 

पूरी दुनिया को इस बात की चिंता थी कि साल 2000 में प्रवेश करते ही कम्प्यूटर काम करना बंद कर देंगे। वायटूके संकट को मिलियन बग भी कहा गया क्योंकि दुनियाभर के कम्प्यूटर में तारीख को लेकर बग आने वाला था। दुनियाभर की सरकारों ने इस समस्या से निपटने के लिए अरबों डॉलर्स खर्च किए। यदि इस बग को ठीक नहीं किया गया होता तो सबसे ज्यादा नुकसान बैकिंग, साइबर सिक्योरिटी और वैज्ञानिक क्षेत्र को होता।
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पीएम मोदी ने क्यों किया Y2K संकट का जिक्र?
आज की ही तरह उस वक्त भी पूरी दुनिया इस संकट से परेशान थी। कोरोना वायरस महामारी की तरह जान पर खतरा तो नहीं था, लेकिन टेक्नोलॉजी जगत में भूचाल आया हुआ था। उस दौर के कम्प्यूटर विशेषज्ञों ने यह कहते हुए हाथ खड़े कर दिए थे कि कम्प्यूटर में 21वीं सदी के लिए पर्याप्त प्रोग्राम नहीं हैं, इसलिए वे ध्वस्त हो सकते हैं। अमेरिका-यूरोप में तो हालात बेहद विषम थे। क्म्प्यूटर का ध्वस्त होना मतलब पावर ग्रिड फेल हो जाना। बैंक सेवाएं बाधित होना। बिक्री और उत्पादन न होने के कारण व्यवसाय चौपट हो जाना। अर्थात अर्थव्यवस्था ही गिर जाना। उस समय तक भारत में इंफोसिस, विप्रो जैसी आईटी कंपनियां शुरू हो चुकी थी। इसके अलावा भारत जैसा सस्ता श्रम और तेज दिमाग दुनिया में कहीं नहीं था। एक अनुमान के मुताबिक इस बग को ठीक करने में विश्व भर को 600 से 1,600 बिलियन यूएस डॉलर्स खर्च करने पड़े थे। तब भारतीय वैज्ञानिकों ने सामने आकर इस संकट का खात्मा किया दुनिया भर में अपनी ताकत का लोहा मनवाया था, जिसके बाद विदेशों में भारतीय कम्प्यूटर इंजीनियर्स की मांग तेजी से बढ़ी।

साभार :- अमर उजाला

रवि रौशन कुमार
शिक्षक, UHS Madhopatti 
Darbhanga (Bihar) 

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