Monday, 22 April 2019

समुद्री प्रदूषण : खतरे में जीवन



 पृथ्वी के धरातल का लगभग 71 प्रतिशत भाग महासागरों से युक्त है । महासागर, प्राकृतिक व मानव निर्मित प्रदूषकों का अन्तिम स्थान हैं । नदियाँ अपने प्रदूषण को समुद्र में डालते हैं । समुद्रतटीय नगरों, शहरी व गावों के गंदे पानी व कूड़ा-करकट को समुद्र में डाला जाता है । हमारे दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका प्लास्टिक जाने-अनजाने में समुद्र और समुद्री जीवों को बहुत ही ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है। पीने के पानी की बोतलें, रैपर, प्लास्टिक थैले, नेट और औद्योगिक कचरा ही नहीं, बल्कि इन प्लास्टिक अवययों के छोटे घटक (माइक्रो प्लास्टिक्स) भी नए-नए किंतु अदृश्य खतरों का कारण बनते जा रहे हैं।


नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओश्यिनोग्राफी (एनआईओ) के 5वें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान वैज्ञानिकों ने कहा है कि प्लास्टिक प्रदूषण बहुत बड़ी समस्या है किंतु माइक्रो प्लास्टिक की समस्या तो उससे भी कहीं ज्यादा भयानक समस्या बनती जा रही है। माइक्रो प्लास्टिक से विश्वभर के महासमुद्रों में पैदा हो रहा प्रदूषण आने वाले समय में बहुत विकट समस्या साबित होगा और यह समस्या इतनी विकट-विकराल होगी कि जो सदियों तक मानव जीवन को प्रभावित करती रहेगी। 
वैज्ञानिक अध्ययन में कहा गया है कि समुद्री जीव प्लास्टिक की बोतलें और थैलियां गलती से निगल लेते हैं जिससे कि इन जीवों की आहार नली अवरुद्ध हो जाती है। इसी तरह बड़े प्लास्टिक पदार्थों के छोटे घटक भी परेशानी का सबब बनते है, क्योंकि ये छोटे घटक परिवर्तित होकर अंतत: मनुष्यों के भोजन का हिस्सा बन जाते हैं। कहा गया है कि इस समस्या का समाधान अकेले सरकार नहीं निकाल सकती है। 

यदि समुद्र में प्लास्टिक के कचरे की समस्या धीरे-धीरे भी दूर करना है तो इसके लिए सरकार के साथ-साथ लोगों की भी भागीदारी जरूरी हो जाती है। राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (एनआईओ) के वैज्ञानिकों ने माइक्रो प्लास्टिक से होने वाले प्रदूषण से जुड़ा जो अनुसंधान शुरू किया है, वह अनुसंधान अपने देश में सर्वथा पहली बार ही किया जा रहा है।
 प्लास्टिक कचरे के समाधान हेतु सुझाया गया है कि समुद्री प्रदूषण के खिलाफ कानून लागू किया जाना चाहिए। मौजूदा प्लास्टिक उत्पादों के विकल्प खोजे जाने चाहिए और समुद्र में मौजूद कचरे की पर्याप्त गंभीरता से साफ-सफाई भी की जाना चाहिए। समुद्री प्रदूषण से जहां समुद्री जीवों का प्रभावित होना तय है, वहीं प्रदूषण प्रभावित समुद्री जीवों के भक्षण से मानव जीवन भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है, लिहाजा छोटे घटकों अर्थात माइक्रो प्लास्टिक्स के खतरों से निपटना बेहद जरूरी हो जाता है।

 अन्यथा नहीं है कि विश्व की आबादी प्रतिवर्ष लगभग अपने वजन के बराबर प्लास्टिक उत्पन्न करती है। प्रतिष्ठित अमेरिकी जर्नल 'साइंस' में प्रकाशित वर्ष 2015 के एक वैश्विक अध्ययन के मुताबिक दुनिया के 192 समुद्र तटीय देशों में तकरीबन 2 टन प्लास्टिक कचरा महासमुद्रों में प्रविष्ट हो गया है। 
 केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीबीसीपी) के आकलन अनुसार प्रतिवर्ष प्रत्येक भारतीय तकरीबन 8 किलोग्राम प्लास्टिक का उपयोग करता है। इसका निष्कर्ष यही हुआ कि भारत में प्रतिवर्ष तकरीबन 100 लाख टन प्लास्टिक का उपयोग किया जाता है। देश में प्रतिदिन 15,000 टन प्लास्टिक कचरा निकलता है जिसमें से सिर्फ 9,000 टन कचरा ही एकत्र और प्रोसेस किया जाता है, बाकी 6,000 टन प्लास्टिक कचरा नदी-नालों, गलियों-सड़कों और बाग-बगीचों सहित समुद्र तटीय क्षेत्रों में यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरा पड़ा रह जाता है, किंतु अब दोबारा इस्तेमाल योग्य नहीं बनाए जा सकने वाले थर्मोसेट प्लास्टिक के लिए गाइड लाइन बनाने का काम केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को दे दिया गया है, ये राहत की बात है। 

प्लास्टिक की थैलियां हमारे रोजमर्रा के जीवन की जरूरत और सुविधा दोनों ही बनती जा रही हैं। प्लास्टिक की थैलियां विक्रेताओं सहित उपभोक्ताओं तक में अति-लोकप्रिय हैं, क्योंकि ये थैलियां आकर्षक, सस्ती, मजबूत और हल्की होती हैं। इन्हें तह करके आसानी से जेब में रखा जा सकता है, लेकिन ये ही प्लास्टिक थैलियां अब जल, जमीन, जंगल के लिए हद दर्जे तक हानिकारक साबित हो रही हैं। जल में रहने वाले समुद्री जीवों, पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्यों और मवेशियों सहित वन्य जीवन को भी खतरनाक ढंग से खत्म करने के लिए ये प्रमुखत: जिम्मेदार बनती जा रही हैं। 

समुद्री प्रदूषण के कारण
समुद्री पर्यावरण विभिन्न स्रोतों और रूपों के माध्यम से दूषित और प्रदूषित हो जाता है। समुद्री प्रदूषण के प्रमुख स्रोत रसायन, ठोस अपशिष्ट, रेडियोधर्मी तत्वों का निर्वहन, औद्योगिक और कृषि प्रदूषण, मानव निर्मित तलछट, तेल फैलाने जैसे कई और कारक हैं। समुद्री प्रदूषण का अधिकांश भाग भूमि से आता है जो समुद्री प्रदूषण में 80 प्रतिशत का योगदान देता हैवायु प्रदूषण भी समुद्री जल में खेतों के कीटनाशक और धूल को पहुँचाता है। वायु और भूमि प्रदूषण बढ़ते समुद्री प्रदूषण में एक प्रमुख योगदान करते हैं जो न केवल जलीय पारिस्थितिकी में बाधा डालते हैं बल्कि भूमीय जीवन को भी प्रभावित करते हैं। गैर-बिंदु स्रोत जैसे हवा से बिखरे हुए मलबे, कृषि प्रवाह और धूल भी प्रदूषण के प्रमुख स्रोत बन गए हैं। इनके अलावा, भूमि अधिग्रहण, प्रत्यक्ष निर्वहन, वायुमंडलीय प्रदूषण, जहाजों के कारण प्रदूषण जैसे कारक और प्राकृतिक संसाधनों का गहरा समुद्र खनन भी प्रदूषण में भारी योगदान देते हैं।
 समूचे विश्व में प्रतिवर्ष तकरीबन 500 खरब प्लास्टिक थैलियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस तरह हम पाते हैं कि इस समय दुनिया में 1 मिनट में 1 अरब से भी ज्यादा ऐसी ही थैलियां इस्तेमाल की जा रही हैं जिनसे हमारा पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है।
 याद रखा जा सकता है कि प्लास्टिक थैलियों के विघटित होने में 1,000 बरस तक का कालखंड समर्पित हो जाता है, वहीं एक खतरनाक खबर यह भी है कि समूचे विश्व में सबसे ज्यादा प्लास्टिक का इस्तेमाल भारत करता है। 
 प्लास्टिक थैलियां खाने से प्रतिवर्ष तकरीबन 1 लाख से ज्यादा पशु-पक्षी मर जाते हैं। प्लास्टिक थैलों का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव भी यही है कि ये नॉन बायोडिग्रेडेबल हैं। यही नहीं, पॉलिथीन की ये थैलियां प्राकृतिक पर्यावरण को प्रदूषित करते हुए उसे भद्दा भी बना रही हैं। बाग-बगीचों, नदियों-तालाबों, सड़कों और समुद्री किनारों पर यहां-वहां बिखरी पड़ीं इन थैलियों से पर्यटन स्थल क्या गंदगी के अड्डे नहीं बन गए हैं
 हम अपनी दैनिक जरूरतों की पूर्ति जैसे उद्योग-धंधों, कल-कारखानों और परिवहन आदि के लिए अत्यंत ही तीव्र गति से गैर-नवीकरणीय संसाधनों का उपयोग कर रहे हैं, जो कि पेट्रोलियम पदार्थों पर आधारित हैं। जिस भी किसी दिन अगर पेट्रोलियम की आपूर्ति समाप्त हो गई तो फिर समझ लो कि उसी दिन ये दुनिया भी आधी ही रह जाएगी। मनुष्यों सहित समुद्री जीवों और वन्य जीवों को भी बचाना बेहद जरूरी है। कोई कारण नहीं है कि ऐसा किया जाना असंभव नहीं है। 
 प्लास्टिक के जन्मकाल से ही हम सुनते आ रहे हैं कि यह एक ऐसा पदार्थ है जिसे पूर्णत: समाप्त नहीं किया जा सकता है। इसे किसी एक आकार-प्रकार से किसी दूसरे आकार-प्रकार में बदल तो सकते हैं, लेकिन संपूर्णत: समाप्त नहीं कर सकते हैं। इसीलिए इसे दुनियाभर में खतरे की घंटी माना जाता है।

 किंतु स्टैंडफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अभी-अभी झींगुर प्रजाति का ही एक छोटा-सा ऐसा कीड़ा ढूंढ निकाला है, जो प्लास्टिक खाता है। अगर शोधकर्ता प्लास्टिक खाने वाले इस कीड़े की प्रजाति का विस्तार करने में सफल हो गए तो संभव है कि फिर प्लास्टिक से मुक्ति भी मिल जाएगी।
  गौरतलब है कि हाल ही में हमारे केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल 2016 अधिसूचित कर दिए हैं। केंद्र सरकार का कहना है कि ये नए नियम अगले 6 महीनों के भीतर प्रभावशील हो जाएंगे। नए नियम इतने सख्त हैं कि थैलियों की न्यूनतम मोटाई 40 से बढ़ाकर 50 माइक्रॉन कर दी गई है। इससे कम माइक्रॉन की थैलियां प्रतिबंधित कर दी गई हैं। इतना ही नहीं, पहले प्लास्टिक की इन थैलियों संबंधित प्रावधान सिर्फ शहरी क्षेत्रों में ही प्रभावशील किए जाते थे और ग्रामीण क्षेत्रों को इन नियमों से मुक्त रखा गया था किंतु नए नियम अब ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भी विस्तारित कर दिए गए हैं।

समुद्री प्रदूषण के प्रभाव


1. समुद्री जल में घुलित ऑक्सीजन की कमी :-
समुद्री जल में प्रदूषकों विशेषकर कार्बनिक प्रदूषकों की मात्रा बढ़ने के साथ ही जल में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा में कमी होती है। इसका कारण यही है कि जल में उपस्थित सूक्ष्म जीव एवं बैक्टीरिया द्वारा प्रदूषक के रूप में उपस्थित कार्बनिक पदार्थों का भक्षण करने के साथ ही उनकी संख्या में वृद्धि होने के फलस्वरूप घुलित ऑक्सीजन की खपत भी बढ़ती है और जल में घुलित ऑक्सीजन उसी तीव्रता से कम होती है। वास्तव में समुद्री जल में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ने से स्वाभाविक रूप से उसकी बीओडी बढ़ जाती है तथा बी.ओ.डी. बढ़ने से जल में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है।\
2. समुद्री जीवों पर प्रभाव :-
समुद्री जल में तेल के रिसाव से समुद्री जल सतह पर तेल की पतली फिल्म बन जाती है, जिससे वातावरण की वायु जल सतह के सीधे सम्पर्क में नहीं आ पाती, जिससे जल में घुलित ऑक्सीजन की सांद्रता कम हो जाती है। इसके अतिरिक्त रिसे हुए तेल को हटाने के लिये उपयोग किए जाने वाले डिटर्जेंट भी समुद्र की जलीय जीवन को अत्यधिक प्रभावित करते हैं। ये रासायनिक डिटर्जेंट अत्यंत विषैले किस्म के होते हैं।
इनके जलीय जीवों द्वारा ग्रहण किए जाने से ये रसायन खाद्य श्रृंखला में आ जाते हैं। साथ ही ये समुद्री सेडीमेंट में भी जमा हो जाते हैं। समुद्री जीवों की अनेक प्रजातियाँ इस प्रकार डिटर्जेंट का शिकार बन समाप्त होती जा रही हैं। डिटर्जेंट को खाने वाले समुद्री जीवों को ग्रहण करने पर मनुष्य के शरीर में भी ये हानिकारक रसायन पहुँच जाते हैं।
3. खाद्य श्रृंखला पर प्रभाव :-
समुद्री प्रदूषण के दौरान प्रदूषकों के समुद्री खाद्य श्रृंखला अथवा सतह के सेडीमेंट के साथ विभिन्न भौतिक रासायनिक क्रियाओं के माध्यम से ये उनमें पहुँच जाते हैं। प्रदूषकों के समुद्री जीवों द्वारा ग्रहण किये जाने अथवा समुद्री वनस्पति द्वारा इनके अवशोषण से इनके माध्यम से ये मनुष्य की खाद्य श्रृंखला में भी पहुँच जाते हैं। अनेक विषैले प्रदूषक समुद्री जीवों एवं वनस्पतियों की मृत्यु का कारण बनते हैं और इस प्रकार समुद्र के पारिस्थितिकीय तंत्र को प्रभावित करते हैं। समुद्री जैव-विविधता पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है।

4. अन्य प्रभाव :-
उपरोक्त के अतिरिक्त समुद्री प्रदूषण का दुष्प्रभाव समुद्रों पर आधारित जीव-जन्तुओं पर भी पड़ता है। अनेक समुद्री पक्षी जो समुद्रों पाये जाने वाले विभिन्न जीवों जैसे- मछलियों आदि पर निर्भर होते हैं, वे या तो खाद्य श्रृंखला में आने वाले प्रदूषकों के कारण मारे जाते हैं या समुद्री जल में पाये जाने वाले पॉलीथीन की थैलियों को निगलकर मर जाते हैं। कई बार पॉलीथीन की थैलियाँ उनकी गर्दन में फँस जाती हैं और दम घुटने के कारण उनकी मृत्यु हो जाती है।


समुद्री प्रदूषण का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव समुद्रों में पाये जाने वाले कोरल पर पड़ रहा है। समुद्री प्रदूषकों में पाये जाने वाले कीटनाशकों, खरपतवार नाशकों, पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बन, विषैली धातुओं एवं रेडियोएक्टिव प्रदूषकों के कारण संवेदनशील कोरल धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं।

सागर-संरक्षण के प्रयास

समुद्रों के बढ़ते प्रदूषण से विश्व के सभी देश चिन्तित हैं। सागर संरक्षण का मसला सर्वप्रथम जून, 1972 में स्टॉकहोम में सम्पन्न हुए 113 देशों के अन्तरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन में उठाया गया था। इसके फलस्वरूप एक नई अन्तरराष्ट्रीय संस्था- महासागर तथा तटवर्ती क्षेत्र कार्यक्रम केन्द्रयानि ओकापाकका उदय हुआ। यह संस्था पूरे विश्व में सागर संरक्षण के लिए कटिबद्ध है। इस संस्था ने सर्वप्रथम सर्वाधिक प्रदूषित भूमध्य सागर की सफाई का अभियान आरम्भ किया। सभी तटवर्ती देश इस बात पर सहमत हो गए हैं कि पारे और संखिया जैसे प्राणघाती जहर समुद्र में न फेंके जाएँ। अब तो ओकापाककी अनुमति से ही आवश्यकतानुसार खतरनाक और विषैले पदार्थ समुद्र तट से दूर गहराई में गिराए जा सकते हैं। डुबाने के पूर्व इन्हें ऐसा बना दिया जाता है कि ये सीधे पानी में मिलकर समुद्री जीवों को नुकसान न पहुँचा सकें।
तेलीय प्रदूषण की रोकथाम के लिए रीजनल ऑयल कंबेटिंग सेंटरनामक संस्था का निर्माण किया गया है। माल्टा के मैनोल द्वीप में स्थित इस संस्थान के दस्ते आग बुझाने वाली गाड़ियों की तरह तमाम साजो-सामान वाले जहाजों से लैस हैं। भूमध्य सागर में कहीं भी तेल फैल जाए तो आग बुझाने वाले संयन्त्र और तेल निगलने वाले उपकरण तुरन्त सक्रिय हो जाते हैं। संयुकत राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूनाइटेड नेशंस एन्वायरमेंट प्रोग्राम) के अधीन पहली बार 17 देशों में 120 प्रयोगशालाएँ बनाई गई जो सागर प्रदूषण की गतिविधियों को दर्ज करती रहती हैं। यह भी पता चला है कि भूमध्य सागर में बहाया गया 85 प्रतिशत मल-जल अनुपचारित होता है। नतीजतन 14 भूमध्य-सागरीय देशों के एक-चौथाई समुद्र-तट स्नान करने योग्य नहीं रहे हैं समुद्री प्रदूषण के कारण अनेक समुद्री जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है क्योंकि प्रदूषित जल में समुद्री जीव बेचैनी महसूस करते हैं और उनका जीवन दूभर हो जाता है।


सागर-संरक्षण के लिए सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं को मिलकर काम करना होगा। कैरीबियन सागर के 29 तटवर्ती देशों ने सागर की सफाई का संकल्प लिया है। निश्चय ही यह एक शुभ संकेत है। आज वैज्ञानिक समुद्री कछुओं, प्रवाल-शैलों, एवं दलदली जमीन में उगने वाली मैंग्रोव वनस्पतियों को बचाने के लिए सतत प्रयत्नशील हैं।

सागर संरक्षण की सबसे सुंदर मिसाल पेश की है फ्रांस ने, जहाँ समुद्रतट पर 43 निगरानी केन्द्र बनाए गए हैं। सागर की स्वच्छता के लिए 2400 लाख डालर की धनराशि भी इकट्ठी की गई है। फ्रांस में सागर संवेदना को जगाने का श्रेय कमांडर कोस्तू को है जिन्होंने दुनियाभर में सागर अभियान का श्रीगणेश किया। उन्होंने सागर की गहराईयों में पल रहे समुद्री जीव-जन्तुओं के प्रति जन-चेतना जागृत की है किन्तु कई मुद्दों पर आज भी अन्तरराष्ट्रीय विवाद जारी है। परमाणु कचरे को समुद्र में डुबाने का मामला ऐसा ही है। अमेरिका और जापान परमाणु कचरे को जलरोधी पेटियों में बंद कर तटवर्ती क्षेत्रों से दूर समुद्र में डुबाने के पक्षधर हैं। उनका मानना है कि यह कचरा समुद्र तल में अनंतकाल तक निरापद पड़ा रहेगा। किन्तु पर्यावरणविद इनसे होने वाले सम्भावित प्रदूषण से चिन्तित हैं। बहरहाल हमारे बहतर कल के लिए यह लाजिमी है कि समुद्र प्रदूषण-मुक्त हों और समुद्री जीव-जन्तु और उपयोगी समुद्री वनस्पतियाँ प्रदूषण की चपेट में न आएँ।

भारत का राष्ट्रीय महासागर विज्ञान संस्थान (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशनोग्राफी) भारतीय समुद्रों पर पैनी नजर रखता है। वैसे अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में तेल-मार्ग होने के कारण जगह-जगह तेल फैला है। तात्पर्य यह है कि दूसरे समुद्रों की तरह हमारे महासागर भी तेलाक्रांत हैं। समुद्री जीव-जन्तुओं, वनस्पतियों और खनिज पदार्थों से हमारा गहरा सरोकार है। अतः समुद्र को प्रदूषण-मुक्त रखना अत्यन्त आवश्यक है। इसी में समाज, राष्ट्र और विश्व का कल्याण निहित है।
 प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल 2016 लागू कर दिए जाने से पॉलिथीन की थैलियों, कैरी बैग आदि की कीमतें 20 फीसदी तक बढ़ जाएंगी। नए नियमों के अंतर्गत दुकानदारों, वेंडरों आदि को इनके इस्तेमाल से पूर्व स्थानीय निकायों में खुद को पंजीकृत कराना होगा जिसके लिए सालाना 48,000 अथवा मासिक 4,000 रुपए फीस चुकाना होगी। इसके बदले में दुकानकार अपने ग्राहकों से इसकी कीमत वसूल सकेंगे, साथ ही उन्हें अपनी दुकानों पर इस आशय का बोर्ड भी टांगना होगा कि उनके यहां उचित मूल्य पर प्रमाणित मात्रा के माइक्रॉन वाली प्लास्टिक थैलियां मिलती हैं।

 इसके अतिरिक्त निर्माता कंपनियों की यह जिम्मेदारी भी होगी कि उक्त कचरा एकत्र करते हुए अपना खुद का कचरा प्रबंधन तंत्र भी उसे स्थापित करना होगा। बहुत संभव है कि इन प्रावधानों का सख्ती से पालन करने पर सकारात्मक नतीजे निकलेंगे और महासमुद्रों को किसी हद तक प्लास्टिक कचरे से मुक्ति भी तभी मिलेगी।
(C) रवि रौशन कुमार 
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