Friday, 8 March 2019

देशभर में मनाया जायेगा वैज्ञानिक ‘चार्ल्स डार्विन’ सप्ताह

उत्पत्ति के सिद्धांत के बारे में ‘आम लोगों के मन में डाले जा रहे भ्रम' को दूर करने के लिए और इंसानों में क्रमिक बदलाव, बंदर से कैसे हो पाया इसे सबूत के साथ साबित करने के लिए देशभर के वैज्ञानिक सोमवार से ‘चार्ल्स डार्विन’ वीक मनाने जा रहे हैं.

द इंडिया मार्च फॉर साइंस ऑर्गनाइजिंग कमिटी और ब्रेकथ्र्यू साइंस सोसायटी 12-18 फरवरी के दौरान डार्विन सप्ताह आयोजित कर रही है.

क्या है डार्विन की ओरिजिन थ्योरी?

ये सिद्धांत प्राकृतिक चयन पर आधारित है जिसके मुताबिक जीवन का विकास लाखों साल पहले एक कोशिकीय जीवों से हुआ. चार्ल्स डार्विन का मानना था कि प्रकृति क्रमिक परिवर्तन से अपना विकास करती है. इस सिद्धांत को विकासवाद का नाम दिया गया.
ब्रेकथ्र्यू साइंस सोसायटी ऑल इंडिया कमिटी के महासचिव बनर्जी ने कहा, ‘हम विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में जायेंगे तथा डार्विन सिद्धांत के बारे में भ्रम दूर करेंगे. हम दिखायेंगे कि ये बस सिद्धांत नहीं है बल्कि इसे सही साबित करने के सैकड़ों तरीके हैं.’

स्रोत:-https://hindi.thequint.com/tech-and-auto/science/scientists-are-organizing-charles-darwin-week-in-all-india

11 अगस्त को सूर्य ग्रहण



स साल का तीसरा और आखिरी सूर्यग्रहण 11 अगस्त को पड़ रहा है. ये सूर्यग्रहण करीब 3 घंटे 30 मिनट तक रहेगा.
भारतीय समय के मुताबिक, ग्रहण शनिवार दोपहर 01:32 बजे शुरू होगा. दोपहर 03:16 पर यह अपने चरम पर होगा और शाम 5:02 बजे खत्म हो जाएगा.
आंशिक सूर्यग्रहण उत्तरी गोलार्ध के कई हिस्सों से दिखाई देगा. लेकिन ये भारत में नजर नहीं आएगा. इस वजह से भारत पर इसका कोई खास असर भी नहीं पड़ेगा.
बता दें, इस साल सबसे पहले 15 फरवरी को सूर्यग्रहण पड़ा था. इसके बाद 13 जुलाई को दूसरा और अब 11 अगस्त को तीसरा सूर्यग्रहण पड़ने जा रहा है. ये तीनों ही आंशिक सूर्यग्रहण हैं और भारत के किसी भाग में नजर नहीं आए.

सूर्यग्रहण क्या होता है?

पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमने के साथ-साथ सौरमंडल का भी चक्कर लगाती है. वहीं पृथ्वी का उपग्रह चंद्रमा भी पृथ्वी का चक्कर लगाता रहता है. इसी प्रक्रिया में जब पृथ्वी और सूर्य के बीच चंद्रमा आ जाता है, तो सूर्यग्रहण होता है. सूर्यग्रहण में सूर्य का थोड़ा हिस्सा या पूरा हिस्सा ढक जाता है. इसी घटना को सूर्यग्रहण कहते हैं

भारत और सूर्यग्रहण

भारत में सूर्यग्रहण को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं. सूर्य को भगवान मानने वाले इस देश में सूर्यग्रहण के दिन पूजा, दान-दक्षिणा और स्नान की मान्यताएं हैं.
सूर्यग्रहण को धर्म-कर्म से जोड़कर देखने वाले लोग राशियों पर इसके ‘असर’ को बेहद गंभीरता से लेते हैं. साथ ही कुछ लोग इस घटना का प्रभाव जानने के लिए ज्योतिषियों की भी मदद लेते हैं.

सूर्यग्रहण को ट्रैक करने का इतिहास

नासा के मुताबिक, किसी भी तरह के ग्रहण का ऑब्जर्वेशन करीब 5 हजार साल पहले शुरू हुआ था. सभी सभ्यताओं के अपने तौर तरीके थे. चीन में कहा जाता था कि कोई आकाशीय ड्रैगन सूरज को खा जाता है. चंद्रग्रहण में चांद को निगल जाता है. इसी आधार पर राजा के शासन की भविष्यवाणी भी की जाती थी.

विज्ञान की तरफ बढ़ता इंसान

ग्रहणों के बारे में फिजिकल रिकॉर्ड रखने की शुरुआत बेबिलोन से मिलती है. यहां 518 से 465 BC के बीच लोगों ने खगोलीय घटनाओं का ब्योरा फिजिकल रिकॉर्ड के तौर पर तैयार किया.

अगले महीने लॉन्‍च हो सकता है ‘चंद्रयान-2’

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) अगले महीने अपने दूसरे चंद्र मिशन 'चंद्रयान-2' लॉन्च कर सकता है.
इसरो के एक सीनियर अधिकारी ने कहा, ‘‘हम सभी पूरी कोशिश कर रहे हैं, मिशन लॉन्च फरवरी में संभव होना चाहिए.’’

चंद्रयान-2 पूरी तरह से स्वदेशी उपक्रम है, जिसमें एक ऑर्बिटर, एक लैंडर और एक रोवर होगा. इसरो के मुताबिक, लैंडर चंद्रमा की सतह पर एक खास जगह पर उतरेगा और वहां एक रोवर तैनात करेगा.
इसरो अधिकारी ने कहा, ‘‘कोई बाधा नहीं है. काम सही तरह से हो रहा है.''
छ: पहियों वाला रोवर धरती से मिलने वाले दिशा-निर्देशों के मुताबिक अर्द्ध-स्वायत्त तरीके से चंद्रमा की सतह पर लैंडर के उतरने के स्थान के इर्द-गिर्द घूमेगा. रोवर में लगे उपकरण चंद्रमा की सतह की स्‍टडी करेंगे और संबंधित जानकारी वापस भेजेंगे. यह जानकारी चंद्रमा की मिट्टी के विश्लेषण के लिए फायदेमंद होगी.
वहीं, 3,290 किलोग्राम वजनी चंद्रयान-2 चंद्रमा की कक्षा में चक्कर लगाएगा और दूरस्थ संवेदी अध्ययन करेगा. इसरो ने कहा कि उपकरण चंद्र स्थल की आकृति, खनिज तत्व प्रचुरता, चंद्रमा के बाहरी आवरण और हाइड्रोक्सिल और जल-हिम का अध्ययन करेंगे.

Ravi Raushan Kumar --- https://raviraushankumar.blogspot.com
Source : https://hindi.thequint.com/tech-and-auto/science/1

किसानों को जहरीले कीटनाशकों से बचाने वाला जैल


 
किसानों द्वारा खेतों में रसायनों का छिड़काव करते समय कोई सुरक्षात्मक उपाय नहीं अपनाने से उनको विषैले कीटनाशकों का शिकार बनना पड़ता है। इंस्टीट्यूट फॉर स्टेम सेल बायोलॉजी ऐंड रीजनरेटिव मेडिसिन के वैज्ञानिकों ने त्वचा पर लगाने वाला "पॉली-ऑक्सीम" नामक एक सुरक्षात्मक जैल बनाया है, जो जहरीले रसायनों को ऐसे सुरक्षित पदार्थों में बदल देता है, जिससे वे मस्तिष्क और फेफड़ों जैसे अंगों में गहराई तक नहीं पहुंच पाते हैं। शोधकर्ताओं ने एक ऐसा मुखौटा विकसित करने की योजना बनाई है जो कीटनाशकों को निष्क्रिय कर सकता है।

Japan puts plans for the world’s next big particle collider on hold

Physicists awaiting approval to build the world’s first “Higgs factory” will have to wait a while longer.

Japan had been expected to decide by March 7 whether it would host the International Linear Collider — a particle smasher that would produce subatomic particles called Higgs bosons far more efficiently than CERN’s Large Hadron Collider. Instead, Japanese officials encouraged the International Committee for Future Accelerators, which oversees the ILC project, to seek partnerships with other governments and funding agencies to help Japan construct the multibillion-dollar accelerator.

“We don’t see it as a dead end,” committee Chair Geoffrey Taylor, a physicist at the University of Melbourne in Australia, said at a news conference streamed live online after the meeting. “We see it as a delay.”

By producing multitudes of Higgs bosons, the proposed ILC would allow scientists to study these particles in unprecedented detail (SN: 2/16/19, p.14). The ILC is currently the most well-developed blueprint for such a “Higgs factory.” But if Japan continues to drag its feet on committing to the ILC, other next-gen accelerators proposed for construction in China and Europe may instead become the world’s hubs for Higgs research.

“We do not have any clear deadline” for when the Japanese government will pass final judgment on the ILC, said Tatsuya Nakada, a physicist at École Polytechnique Fédérale de Lausanne in Switzerland who heads the committee’s Linear Collider Board.
दिनांक 23.02.2019 (शनिवार) को राजकीय उत्क्रमित माध्यमिक विद्यालय, माधोपट्टी के शिक्षक रवि रौशन कुमार को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गांधी पर्यावरण योद्धा सम्मान-2019 दिया गया. उन्हे यह सम्मान उनके द्वारा विगत 10 वर्षों में किए गए पर्यावरणीय जागरूकता अभियान(आलेख लेखन, वृक्षारोपण, विभिन्न परियोजना निर्माण, बच्चों के बीच कार्यशाला का आयोजन इत्यादि) के लिए दिया गया है. इस अवसर पर रवि रौशन कुमार को प्रशस्ति पत्र भी दिया गया. उक्त कार्यक्रम में नेपाल के प्रदेश प्रमुख  महामहिम रत्नेश्वर लाल कायस्थ, बांग्लादेश के प्रतिनिधि अकारामूल हफीज चौधरी उपस्थित थे. कार्यक्रम में श्रीलंका, भारत, नेपाल तथा बांग्लादेश के कई प्रतिनिधि भी उपस्थित थे.