Thursday, 12 September 2019

पॉलीथिन का उपयोग घातक

सभी वैज्ञानिक आविष्कारों के पीछे समाज कल्याण की भावना छिपी रहती है। दुनिया के तमाम आविष्कार जनहित के लिये ही होता है। परंतु प्रत्येक कृत्रिम सुख सुविधाओं के अपने लाभ और हानि होती है। जब किसी वस्तु या सुविधा के लाभ उसके हानि की तुलना में कई गुना अधिक होता है तब हम उन नवीन आविष्कार को अपना लेते हैं। कभी-कभी दूरगामी प्रभावों की चिंता किये बिना ही हम किसी नवीन आविष्कारों को सिर्फ इसलिये भी अपना लेते है क्योंकि वे हमारे श्रम, समय और पैसे की बचत करता है। प्लास्टिक का ही उदाहरण अगर लिया जाय तो हम देखते हैं कि जब प्लास्टिक या पॉलीथिन आदि का इस्तेमाल प्रारम्भ हुआ था उस वक़्त यह किसी वरदान से कम नहीं था। धरल्ले से प्लास्टिक प्रयोग शुरू हो गया। रोजमर्रा के जीवन में प्लास्टिक ने अपनी पैठ बना ली। लोगों ने भी इसे हाथोंहाथ लेना शुरू किया। कपड़े और जूट के बने थैले लेकर चलने में शर्मिंदगी का एहसास होने लगा। लोग खाली हाथ बाजार जाते और प्लास्टिक के ढेर सारे थैलों में चीजें भर-भर कर घर लाने लगे थे। लेकिन समय के साथ-साथ पॉलीथिन के दुष्परिणाम भी सामने आने लगे। आज ये गम्भीर चिंता का विषय बन चुकी है। आम आदमी से लेकर सरकार में बैठे लोगों के लिये प्लास्टिक से निपटने की गम्भीर चुनौती सामने है। जिस प्लास्टिक ने हमारे जीवन को सरल बनाया था उसे अपने जीवन से सदा-सदा के लिये दूर कर देने पर विवश हैं। 
कूड़े-कचड़ों के ढेर में 50% से अधिक मात्रा पोलिथिनों और प्लास्टिक से बनी वस्तुओं की है। प्लास्टिक के कचड़े भूमिगत जल सहित धरातलीय जल को तो दूषित करते हैं; साथ ही साथ बारिश के जल को जमीन के अंदर जाने से रोकते हैं। आजकल कूड़े कचड़ों के ढेर से जानवरों को पॉलिथिन का सेवन करते हुए देखना आम बात सी हो गयी है। प्लास्टिक के सेवन करने से ये जानवर बीमारी के शिकार हो रहे हैं। कई मामलों में इनकी मौत तक हो जाती है। प्लास्टिक के बोतलों से जल अथवा अन्य पेय पदार्थों के सेवन से मानव शरीर मे कैंसर तक का खतरा बढ़ गया है। हम प्लास्टिक के इस कदर आदि हो चुके हैं कि इसे छोड़ने को तैयार नहीं है। 

ये तो सिर्फ एक उदाहरण हैं ऐसी ढेरों चीजें हम इस्तेमाल करते हैं जिसके इस्तेमाल और उत्पादन की दर को नियंत्रित नहीं किया गया तो हमारे अस्तित्व पर ख़तरा उत्त्पन्न हो सकता है। जैसे;- स्मार्ट फोन, ई-कचड़ा, अंतरिक्ष कचड़ा, नाभिकीय कचड़ा इत्यादि। अभी भी वक़्त है हम मनुष्य अगर इन आसन्न संकटों के प्रति अगर जागरूक नहीं हुए और इन भौतिक सुख-सुविधाओं से अपना मोह भंग नहीं कर पाए तो वह दिन दूर नहीं जब पृथ्वी पर जीवन के समस्त स्वरूप समाप्त हो जाएंगे।

©रवि रौशन कुमार
दरभंगा, बिहार 

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