(कल्पना चावला विज्ञान क्लब, दरभंगा की प्रस्तुति)
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वैज्ञानिकों ने धातु का एक ऐसा सांचा तैयार किया है जो सौर सेल में कैद की गई सूरज की रोशनी की मात्रा को बढ़ा कर उसके ऊर्जा उत्पादन को लगभग एक तिहाई तक बढ़ा सकता है. शोधकर्ताओं ने कहा कि विकासशील देशों के साथ-साथ मूलभूत सुविधाओं से वंचित दूरस्थ क्षेत्रों के लिए कैद की गई सौर ऊर्जा इस साधारण, सस्ते एवं सरल तरीके से बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
अमेरिका की कोलगेट यूनिवर्सिटी की सह-प्राध्यापक बेथ पार्क्स ने कहा, “युगांडा में 20 से 25 प्रतिशत लोगों के पास बिजली नहीं है.” पार्क्स ने कहा, “एक सौर सेल इतनी ऊर्जा देता है कि लाइट जल सके और सेलफोन एवं रेडियो चार्ज हो सकें. जीवन में सुधार का यह बेहद उम्दा रास्ता है.” सौर पैनल भले ही नवीकरणीय ऊर्जा का शुद्ध स्रोत हैं लेकिन आम तौर पर वह एक निश्चित सांचे में ढले होते हैं और दिन के कुछ खास घंटों में सूरज की तरफ सबसे बेहतर तरीके से मुड़े रहते हैं.
पार्क्स ने युगांडा की मंबारारा यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के छात्रों के साथ काम कर धातु की एक ट्यूब के प्रयोग से एक डिजाइन तैयार किया जिसे स्थानीय वेल्डर आसानी से हासिल कर सकता है एवं फिट कर सकता है.
पार्क्स ने कहा, “हमने सस्ती वस्तुओं से एक सांचा तैयार किया है जो दिनभर सूरज की रोशनी की दिशा का पता लगाने में सौर पैनल के लिए मददगार साबित होंगे.” उन्होंने कहा, “इस तरीके से विकासशील देशों के घरों एवं छोटे कारोबारों के लिए सौर ऊर्जा अधिक सस्ती और सुलभ बन सकती है.”
'साइलेंट वैली' ये नाम अधिकतर लोगों ने शायद पहली बार सुना होगा. इसके नाम से ऐसा प्रतीत होता है मानो विदेश की कोई ख़ूबसूरत जगह हो, लेकिन आपको जानकारी दे दें कि ये ख़ूबसूरत वैली भारत के केरल राज्य में स्थित है.
केरल के पलक्कड़ ज़िले के पश्चिमी घाट पर स्थित 'साइलेंट वैली' अपनी जैव विविधता के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है. उत्तर में नीलगिरि की पहाडि़यां और दक्षिण में फैले मैदान के बीच होने के कारण ये घाटी 'साइलेंट वैली' के नाम से जानी जाती है.
अगर आप भी घूमने-फिरने के शौक़ीन हैं, तो 'साइलेंट वैली' एक ऐसी जगह है जहां जाकर आप वेकेशन का जमकर लुत्फ़ उठा सकते हैं. यहां की ख़ूबसूरती को निहारने के साथ-साथ आप यहां जंगल सफ़ारी का आनंद भी ले सकते हैं. 'साइलेंट वैली' अपनी ख़ूबसूरती के साथ-साथ कई तरह-तरह के पशु-पक्षियों और फूल-पौधों के लिए भी जानी जाती है.
'साइलेंट वैली' केरल के अंतिम वर्षा वनों के रूप में भी प्रसिद्ध है. इसलिए साल 1984 में इसे 'राष्ट्रीय उद्यान' का दर्जा हासिल हुआ. वहीं साल 2012 में यूनेस्को ने इसे 'विश्व धरोहर' की सूची में शामिल किया.
राष्ट्रीय उद्यान होने के कारण 'साइलेंट वैली' में कई तरह के जानवर जैसे हाथी, बाघ, सांभर, चीता वांडरू लंगूर व जंगली सुअर देखने को मिल जायेंगे. इसके साथ ही ये पूरी घाटी 1000 से भी ज़्यादा फूलों से भी महकती नज़र आती है. इसके साथ ही यहां करीब 110 किस्म के ऑर्किड, 200 किस्म की तितलियां व पक्षियों की करीब 170 प्रजातियां भी पाई जाती हैं.
‘साइलेंट वैली’ भारत के सबसे लुप्तप्राय स्तनपायी प्राणियों में से एक वांडरू प्रजाति के लंगूर के लिए भी प्रसिद्ध है.
'साइलेंट वैली' की सबसे ख़ास बात है कि यहां दूसरे नेशनल पार्क जैसी भीड़ देखने को नहीं मिलती. यहां का शांत वातावरण नेचर लवर्स को ख़ूब भाता है. जीव-जंतुओं को देखने और उन्हें अपने कैमरे में क़ैद करने का इससे बेहतर मौका कहीं और नहीं मिल सकता.
'साइलेंट वैली' की एक ख़ास बात ये भी है कि यहां पर कुंती नदी नीलगिरी पर्वत के 2000 मीटर की ऊंचाई से बहती है. जो इस घाटी से गुज़रती हुई मैदानों की ओर बहती है. इस नदी से क्रिस्टल क्लीयर पानी का अद्भुद नज़ारा भी देखने लायक होता है.
इतिहासकारों के मुताबिक़ अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां आकर रुके थे. स्थानीय लोग इसे सैरन्ध्रीवनम के नाम से भी जानते हैं. दरअसल, सैरन्ध्री द्रौपदी का ही एक नाम था. इस ख़ूबसूरत जगह की खोज साल 1847 में ब्रिटिश वनस्पतिशास्त्री रॉबर्ट वाइट ने की थी. सैरन्ध्री बोल पाना उनके लिए मुश्किल होता था इसलिए उन्होंने इसका नाम 'साइलेंट वैली' रखा.
'साइलेंट वैली' पहुंचना बेहद आसान है. नज़दीकी हवाई अड्डा कोयंबटूर है. यहां से करीब डेढ़ घंटे में आप पलक्कड़ पहुंच सकते हैं. पलक्कड़ शहर में रेलवे स्टेशन भी है जो देश के रेल नेटवर्क से जुड़ा हुआ है. यहां की सड़क यातायात की सुविधा भी अच्छी है.
ब्रितानी शासनकाल ने भारत को कई चीज़ें दी हैं. इनमें से एक अहम चीज़ है पूरे देश का एक ही टाइमज़ोन में होना.
कई लोगों के अनुसार ये अनेकता में एकता का प्रतीक है. लेकिन ऐसा नहीं है कि सभी मानते हों कि भारतीय मानक समय यानी इंडियन स्टेंडर्ड टाइम एक अच्छी चीज़ है. पढ़िए क्यों.
पूर्व से पश्चिम तक भारत 3,000 किलोमीटर यानी 1,864 मील तक चौड़ा है. देशान्तर रेखा पर देखें तो ये कम से कम 30 डिग्री तक के इलाके में फैला है. सूर्य को आधार बना कर होने वाली समय की गणना के अनुसार इसका मतलब है कि एक छोर से दूसरे छोर तक समय का फर्क कम से कम दो घंटे का है.
इस फर्क का अंदाज़ा न्यू यॉर्क और यूटा के समय को देखने पर पता चलता है. अगर ये दोनों जगहें भारत में होतीं तो दोनों जगहों पर समय एक ही होता. लेकिन, भारत में इस छोटे से फर्क का असर लाखों लोंगों पर पड़ा है.
भारत के सूदूर पश्चिमी छोर के मुकाबले देश के पूर्व में सूर्योदय तकरीबन दो घंटे पहले होता है.
पूरे देश के लिए एक मानक समय की आलोचना करने वालों का कहना है कि देश के पूर्वोत्तर में सूर्य की रोशनी का पूरा इस्तेमाल करने के लिए ये ज़रूरी है कि भारत में दो मानक समय को स्वीकार किया जाए. पूर्व में सूर्य की रोशनी जल्दी पड़ती है और इस कारण वहां इसका इस्तेमाल पहले शुरु हो सकता है.
हमारे शरीर के भीतर एक घड़ी होती है जो एक नियत ताल पर चलती है, इसे सिर्काडियन रिदम कहते हैं. सूर्य का उदय होना और ढलना इस ताल को सीधे तौर पर प्रभावित करता है. जैसे-जैसे सांझ होने लगती है हमारे शरीर में नींद को प्रभावित करने वाला हॉर्मोन मेलाटोनिन बनता है, इस कारण व्यक्ति को नींद आने लगती है.
कॉर्नेल विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्री मौलिक जगनानी अपने शोध में कहते हैं कि पूरे देश में एक ही मानक समय होना का असर बच्चों की नींद की गुणवत्ता पर पड़ता है, ख़ास कर ग़रीब बच्चों की नींद पर. वो कहते हैं कि इसका सीधा असर उनकी शिक्षा पर पड़ता है.
ये कैसे हो सकता है?
चूंकि पूरे भारत में एक ही मानक समय को अपनाया गया है तो देश भर के स्कूल लगभग एक ही समय पर खुलते हैं. लेकिन, जिन जगहों पर सूर्य देर से अस्त होता है वहां बच्चे देर में सोने जाते हैं और इस कारण उन्हें जितनी नींद मिलनी चाहिए उससे कम नींद मिलती है.
अगर सूर्य के अस्त होने में एक घंटे की देरी है तो बच्चे को इस कारण आधे घंटी की नींद कम मिलती है.
इंडियन टाइम सर्वे और भारतीय डेमोग्राफिक एंड हेल्थ सर्वे के तहत जमा किए गए आंकड़ों का आकलन करने के बाद मौलिक जगनानी का कहना है कि जिन जगहों पर सूर्य देर में डूबता है वहां बच्चों को मिलने वाली शिक्षा का वक्त भी कम हो जाता है और ऐसी जगहों में बच्चों के प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल छोड़ने की आशंका अधिक रहती है.
उनका कहना है कि सूरज के देर में डूबने के कारण अधिकतर ग़रीब परिवारों के बच्चों को नींद कम मिलती है. ख़ास कर ऐसे परिवारों में जो मुश्किल आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं.
जगनानी कहते हैं, "इसका कारण ये हो सकता है कि गरीब परिवारों में बच्चों को शोर-शराबे, गर्मी, मच्छर, भीड़-भाड़ और मुश्किल शारीरिक हालातों में सोना पड़ता है. इसकी उम्मीद कम होती है कि गरीब परिवार बेहतर नींद के लिए खिड़कियों में पर्दे, अलग कमरे, घर के भीतर बिस्तर जैसी सुविधाओं में कम निवेश करेंगे और अधिकतर तो अनपी नींद के साथ भी समझौता कर लेते हैं."
"इसके साथ ही वो तनाव, नकारात्मक सोच और रोज़मर्रा की ज़रूरतों के बोझ के कारण मानसिक तनाव में भी होते हैं. इस कारण उनके फैसले भी प्रभावित हो सकते हैं."
जगनानी कहते हैं कि अगर सूर्य के अस्त होने के समय के अनुसार एक ज़िले की भी बात करें तो पूर्वी और पश्चिमी छोर की जगहों में बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता अलग-अलग पाई गई है.
वो कहते हैं कि शोध से पता चलता है कि सालाना औसत के अनुसार सूर्य के अस्त होने में एक घंटे की देरी का फर्क होने से बच्चे की पढ़ाई के 0.8 साल कम हो जाते हैं और ऐसी जगहों पर बच्चों के प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल छोड़ने की आशंका अधिक रहती है.
जगनानी कहते हैं कि अगर भारत एक ही मानक समय की जगह दो मानक समय की नीति अपना ले (पश्चिम भारत के लिए यूटीसी +5 घंटे और पूर्वी भारत के लिए यूटीसी +6 घंटे) तो भारत को सालाना तौर पर 452 करोड़ से अधिक की मानव पूंजी यानी जीडीपी का 0.2 फीसद का लाभ मिलेगा.
कोऑर्डिनेटेड यूनिवर्सल टाइम यानी यूटीसी का अर्थ ग्रीनविच मीन टाइम से ही होता है लेकिन इसे एक एटॉमिक घड़ी की मदद से आंका जाता है और ये अधिक सही होता है.
दो मानक समय ज़ोन को अपनाने को लेकर भारत में लंबी बहस चली है. उत्तर-पूर्वी असम में चाय बागानों में काम करने वाले मज़दूर लंबे वक्त से अपनी घड़ियों में भारतीय मानक समय से एक घंटे पहले का वक़्त रखते हैं. ये एक तरह से एक दूसरे मानक समय को अपनाने जैसा है.
1980 के दशक के आख़िर में एक नामी ऊर्जा संस्थान के शोधकर्ताओं के एक दल ने बिजली बचाने के लिए एक मानक समय की व्यवस्था सुझाई थी. 2002 में एक सरकारी पैनल ने इसमें मुश्किलों का हवाला देते हुए इस तरह के एक प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया था.
कुछ विशेषत्ज्ञों को लगता है कि इसमें ट्रेनों के एक्सीडेंट का ख़तरा अधिक है क्योंकि अलग मानक समय ज़ोन में प्रवेश करते ही उनका समय बदलना ज़रूरी होगा.
हालांकि, बीते साल आधिकारिक भारतीय टाइमकीपर्स ने खुद ही दो मानक समय ज़ोनका सुझाव दिया था- एक मानक समय देश के आठ उत्तर पूर्वी राज्यों के लिए जिनमें सात बहनें शामिल हैं और दूसरा शेष भारत के लिए. इन दोनों मानक समय ज़ोन में एक घंटे का फर्क सुझाया गया था.
नेशनव फिज़िकल लेबोरेटरी के शोधकर्ताओं के अनुसार एक ही मानक समय ज़ोन का होना "जीवन को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है" क्योंकि आधिकारिक तौर पर काम करने के समय से काफी जल्दी सूर्योदय और सूर्यास्त होता है.
जल्दी सूर्योदय होने के कारण दफ्तरों में काम के घंटों का नुकसान होता है क्योंकि स्कूल और कॉलेज सूरज की रोशनी का सही लाभ लेने के लिए "देरी से" खुलते हैं. सर्दी के दिनों में हालात और बुरे हो जाते हैं क्योंकि सूरज जल्दी ढलता है और "काम बंद ना हो" इसलिए बिजली की खपत भी बढ़ जाती है.
इसका सार यही है कि नींद का सीधा नाता व्यक्ति की उत्पादकता से है और ग़लत समय ज़ोन में होने का कारण लोगों की, ख़ास कर ग़रीब बच्चों की ज़िंदगी प्रभावित हो सकती है.
घर के अंदर की प्रदूषित हवा और बाहर के वायु प्रदूषण के कारण हर साल करीब 70 लाख लोगों की मौत हो रही है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार और पर्यावरण के जानकारों ने इस आंकड़े की पुष्टि की है। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ ने यह भी कहा कि प्रदूषित वायु में सांस लेने के कारण गंभीर बीमारियां हो रही हैं।
प्रमुख बिन्दू :-
यूएन के विशेषज्ञ डेविड बोयड ने कहा, 6 अरब लोग नियमित रूप से इतनी प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं
पर्यावरण के जानकारों का कहना है कि हर साल इससे 70 लाख लोग मर रहे हैं
प्रदूषित हवा के कारण मरनेवालों में हर साल लगभग 6 लाख बच्चे होते हैं
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संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण एवं मानवाधिकारों के जानकार ने कहा है कि घर के अंदर और बाहर होने वाले वायु प्रदूषणके कारण हर साल करीब 70 लाख लोगों की मौत समय से पहले हो जाती है। इनमें 6 लाख बच्चे शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ डेविड बोयड ने कहा कि करीब छह अरब लोग नियमित रूप से इतनी प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं कि इससे उनका जीवन और स्वास्थ्य जोखिम में घिरा रहता है।
र्यावरण और मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक ने सोमवार को मानवाधिकार परिषद से कहा, 'इसके बावजूद इस महामारी पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। ये मौतें अन्य आपदाओं या महामारियों से होने वाली मौतों की तरह नाटकीय नहीं हैं। हर घंटे 800 लोग मर रहे हैं जिनमें से कई तकलीफ झेलने के कई साल बाद मर रहे हैं, कैंसर से, सांस संबंधी बीमारी से या दिल की बीमारी से जो प्रत्यक्ष तौर पर प्रदूषित हवा में सांस लेने के कारण होती है।'
कनाडा की ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी में असोसिएट प्रफेसर बोयड ने कहा कि स्वच्छ हवा सुनिश्चित नहीं कर पाना स्वस्थ पर्यावरण के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि यह वे अधिकार हैं जिन्हें 155 देशों ने कानूनी मान्यता दी है और इसे वैश्विक मान्यता प्राप्त होनी चाहिए। उन्होंने 7 अहम कदमों की पहचान की जिसे स्वच्छ हवा सुनिश्चित करने के लिए देशों को उठाना चाहिए।
इनमें वायु गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य पर उसके प्रभावों की निगरानी, वायु प्रदूषण के स्रोतों का आकलन और जन स्वास्थ्य परामर्शों समेत अन्य सूचनाओं को सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध कराना शामिल है। बोयड ने कहा, ‘अच्छे चलन के कई उदाहरण हैं जैसे भारत और इंडोनेशिया के कार्यक्रम जिन्होंने कई गरीब परिवारों को खाना पकाने की स्वच्छ तकनीकों की तरफ मोड़ा है। ऐसे देश जो कोयले से चलने वाले ऊर्जा संयंत्रों के इस्तेमाल को खत्म कर रहे हैं।'
वैज्ञानिकों ने 16 नवंबर 2018 को सर्वसम्मति से किलोग्राम की परिभाषा बदलने का निर्णय लिया है. इस नई परिभाषा के परिणामस्वरूप पेरिस में 1889 में अपनाए गए प्लैटिनम अलॉय सिलिंडर का उपयोग बंद हो जाएगा.
प्लैंक कांस्टेंट द्वारा पुनर्परिभाषित नए सिस्टम में द्रव्यमान की यूनिट इलेक्ट्रिकल फोर्स के ज़रिए निर्धारित होती है. ये नए बदलाव 20 मई 2019 से वर्ल्ड मेट्रोलोजी डे पर प्रभाव में आएंगे.
स्मरणीय तथ्य
वैज्ञानिकों ने किलोग्राम की परिभाषा बदल दी है. नई परिभाषा को 50 से ज़्यादा देशों ने सर्वसम्मति से मंजूरी भी दे दी है.
वर्तमान में इसे प्लेटिनम से बनी एक सिल के वज़न से परिभाषित किया जाता है जिसे ली ग्रैंड के (Le Grand K) कहा जाता है. ऐसी एक सिल पश्चिमी पेरिस में इंटरनेशनल ब्यूरो ऑफ़ वेट्स एंड मेज़र्स (बीआईपीएम) के पास साल 1889 से बंद है.
वैज्ञानिकों का पक्ष था कि किलोग्राम को यांत्रिक और विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा के आधार पर परिभाषित किया जाए.
भविष्य में किलोग्राम को किब्बल या वाट बैलेंस का उपयोग करके मापा जाएगा. यह एक ऐसा उपकरण है जो यांत्रिक और विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा का उपयोग करके सटीक गणना करता है.
ऐसा होने पर किलोग्राम की परिभाषा न बदली जा सकेगी और न ही इसे कोई नुकसान पहुँचाया जा सकेगा. यह न केवल फ्रांस में बल्कि दुनिया में कहीं भी वैज्ञानिकों को एक किलो का सटीक माप उपलब्ध करवाएगा.
अंतरराष्ट्रीय मानक प्रणाली में किलो
अंतरराष्ट्रीय मानक प्रणाली में किलो सात बेसिक यूनिट्स में से एक है. उनमें से चार हैं- किलो, एंपियर (विद्युत प्रवाह), केल्विन (ताप) और मोल (पार्टिकल नंबर). किलोग्राम अंतिम एसआई बेस यूनिट है जो अभी तक एक फ़िज़ीकल ऑब्ज़ेक्ट द्वारा परिभाषित है.
क्यों किया गया परिवर्तन?
19वीं शताब्दी में फ्रांस के अंतरराष्ट्रीय ब्यूरो ऑफ वेट एंड मेजर्स (BIPM) के दफ्तर में एक कांच के कटोरे में प्लेटिनम इरीडियम धातु (Le Grand K) का एक टुकड़ा रखा गया था. इसका आकार सिलिंडर के जैसा है. ली ग्रैंड के' लंदन में निर्मित 90 प्रतिशत प्लेटिनम और दस प्रतिशत इरिडियम से बना 4 सेंटीमीटर का एक सिलेंडर है, जो पश्चिमी पेरिस के सीमांत सेवरे में इंटरनेश्नल ब्यूरो ऑफ़ वेट्स एंड मेजर्स (बीआईपीएम) के वॉल्ट में साल 1889 से बंद है.
वैज्ञानिकों का मानना है कि फ़िज़ीकल ऑब्ज़ेक्ट आसानी से परमाणु को खो सकते हैं या हवा से अणुओं को अवशोषित कर सकते हैं, इसी कारण इसकी मात्रा माइक्रोग्राम में दसियों बार बदली गई थी. इसका अर्थ यह हुआ कि किलोग्राम और स्तर मापने के लिए दुनिया भर में प्रोटोटाइप का उपयोग किया जाता है. सामान्य जीवन में इसे मापा नहीं जा सकता लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए यह समस्या पैदा कर सकता है.
उत्पत्ति के सिद्धांत के बारे में ‘आम लोगों के मन में डाले जा रहे भ्रम' को दूर करने के लिए और इंसानों में क्रमिक बदलाव, बंदर से कैसे हो पाया इसे सबूत के साथ साबित करने के लिए देशभर के वैज्ञानिक सोमवार से ‘चार्ल्स डार्विन’ वीकमनाने जा रहे हैं.
द इंडिया मार्च फॉर साइंस ऑर्गनाइजिंग कमिटी और ब्रेकथ्र्यू साइंस सोसायटी 12-18 फरवरी के दौरान डार्विन सप्ताह आयोजित कर रही है.
क्या है डार्विन की ओरिजिन थ्योरी?
ये सिद्धांत प्राकृतिक चयन पर आधारित है जिसके मुताबिक जीवन का विकास लाखों साल पहले एक कोशिकीय जीवों से हुआ. चार्ल्स डार्विन का मानना था कि प्रकृति क्रमिक परिवर्तन से अपना विकास करती है. इस सिद्धांत को विकासवाद का नाम दिया गया.
ब्रेकथ्र्यू साइंस सोसायटी ऑल इंडिया कमिटी के महासचिव बनर्जी ने कहा, ‘हम विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में जायेंगे तथा डार्विन सिद्धांत के बारे में भ्रम दूर करेंगे. हम दिखायेंगे कि ये बस सिद्धांत नहीं है बल्कि इसे सही साबित करने के सैकड़ों तरीके हैं.’
स साल का तीसरा और आखिरी सूर्यग्रहण 11 अगस्त को पड़ रहा है. ये सूर्यग्रहण करीब 3 घंटे 30 मिनट तक रहेगा.
भारतीय समय के मुताबिक, ग्रहण शनिवार दोपहर 01:32 बजे शुरू होगा. दोपहर 03:16 पर यह अपने चरम पर होगा और शाम 5:02 बजे खत्म हो जाएगा.
आंशिक सूर्यग्रहण उत्तरी गोलार्ध के कई हिस्सों से दिखाई देगा. लेकिन ये भारत में नजर नहीं आएगा. इस वजह से भारत पर इसका कोई खास असर भी नहीं पड़ेगा.
बता दें, इस साल सबसे पहले 15 फरवरी को सूर्यग्रहण पड़ा था. इसके बाद 13 जुलाई को दूसरा और अब 11 अगस्त को तीसरा सूर्यग्रहण पड़ने जा रहा है. ये तीनों ही आंशिक सूर्यग्रहण हैं और भारत के किसी भाग में नजर नहीं आए.
सूर्यग्रहण क्या होता है?
पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमने के साथ-साथ सौरमंडल का भी चक्कर लगाती है. वहीं पृथ्वी का उपग्रह चंद्रमा भी पृथ्वी का चक्कर लगाता रहता है. इसी प्रक्रिया में जब पृथ्वी और सूर्य के बीच चंद्रमा आ जाता है, तो सूर्यग्रहण होता है. सूर्यग्रहण में सूर्य का थोड़ा हिस्सा या पूरा हिस्सा ढक जाता है. इसी घटना को सूर्यग्रहण कहते हैं
भारत और सूर्यग्रहण
भारत में सूर्यग्रहण को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं. सूर्य को भगवान मानने वाले इस देश में सूर्यग्रहण के दिन पूजा, दान-दक्षिणा और स्नान की मान्यताएं हैं.
सूर्यग्रहण को धर्म-कर्म से जोड़कर देखने वाले लोग राशियों पर इसके ‘असर’ को बेहद गंभीरता से लेते हैं. साथ ही कुछ लोग इस घटना का प्रभाव जानने के लिए ज्योतिषियों की भी मदद लेते हैं.
सूर्यग्रहण को ट्रैक करने का इतिहास
नासा के मुताबिक, किसी भी तरह के ग्रहण का ऑब्जर्वेशन करीब 5 हजार साल पहले शुरू हुआ था. सभी सभ्यताओं के अपने तौर तरीके थे. चीन में कहा जाता था कि कोई आकाशीय ड्रैगन सूरज को खा जाता है. चंद्रग्रहण में चांद को निगल जाता है. इसी आधार पर राजा के शासन की भविष्यवाणी भी की जाती थी.
विज्ञान की तरफ बढ़ता इंसान
ग्रहणों के बारे में फिजिकल रिकॉर्ड रखने की शुरुआत बेबिलोन से मिलती है. यहां 518 से 465 BC के बीच लोगों ने खगोलीय घटनाओं का ब्योरा फिजिकल रिकॉर्ड के तौर पर तैयार किया.