Monday, 22 April 2019

समुद्री प्रदूषण : खतरे में जीवन



 पृथ्वी के धरातल का लगभग 71 प्रतिशत भाग महासागरों से युक्त है । महासागर, प्राकृतिक व मानव निर्मित प्रदूषकों का अन्तिम स्थान हैं । नदियाँ अपने प्रदूषण को समुद्र में डालते हैं । समुद्रतटीय नगरों, शहरी व गावों के गंदे पानी व कूड़ा-करकट को समुद्र में डाला जाता है । हमारे दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका प्लास्टिक जाने-अनजाने में समुद्र और समुद्री जीवों को बहुत ही ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है। पीने के पानी की बोतलें, रैपर, प्लास्टिक थैले, नेट और औद्योगिक कचरा ही नहीं, बल्कि इन प्लास्टिक अवययों के छोटे घटक (माइक्रो प्लास्टिक्स) भी नए-नए किंतु अदृश्य खतरों का कारण बनते जा रहे हैं।


नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओश्यिनोग्राफी (एनआईओ) के 5वें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान वैज्ञानिकों ने कहा है कि प्लास्टिक प्रदूषण बहुत बड़ी समस्या है किंतु माइक्रो प्लास्टिक की समस्या तो उससे भी कहीं ज्यादा भयानक समस्या बनती जा रही है। माइक्रो प्लास्टिक से विश्वभर के महासमुद्रों में पैदा हो रहा प्रदूषण आने वाले समय में बहुत विकट समस्या साबित होगा और यह समस्या इतनी विकट-विकराल होगी कि जो सदियों तक मानव जीवन को प्रभावित करती रहेगी। 
वैज्ञानिक अध्ययन में कहा गया है कि समुद्री जीव प्लास्टिक की बोतलें और थैलियां गलती से निगल लेते हैं जिससे कि इन जीवों की आहार नली अवरुद्ध हो जाती है। इसी तरह बड़े प्लास्टिक पदार्थों के छोटे घटक भी परेशानी का सबब बनते है, क्योंकि ये छोटे घटक परिवर्तित होकर अंतत: मनुष्यों के भोजन का हिस्सा बन जाते हैं। कहा गया है कि इस समस्या का समाधान अकेले सरकार नहीं निकाल सकती है। 

यदि समुद्र में प्लास्टिक के कचरे की समस्या धीरे-धीरे भी दूर करना है तो इसके लिए सरकार के साथ-साथ लोगों की भी भागीदारी जरूरी हो जाती है। राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (एनआईओ) के वैज्ञानिकों ने माइक्रो प्लास्टिक से होने वाले प्रदूषण से जुड़ा जो अनुसंधान शुरू किया है, वह अनुसंधान अपने देश में सर्वथा पहली बार ही किया जा रहा है।
 प्लास्टिक कचरे के समाधान हेतु सुझाया गया है कि समुद्री प्रदूषण के खिलाफ कानून लागू किया जाना चाहिए। मौजूदा प्लास्टिक उत्पादों के विकल्प खोजे जाने चाहिए और समुद्र में मौजूद कचरे की पर्याप्त गंभीरता से साफ-सफाई भी की जाना चाहिए। समुद्री प्रदूषण से जहां समुद्री जीवों का प्रभावित होना तय है, वहीं प्रदूषण प्रभावित समुद्री जीवों के भक्षण से मानव जीवन भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है, लिहाजा छोटे घटकों अर्थात माइक्रो प्लास्टिक्स के खतरों से निपटना बेहद जरूरी हो जाता है।

 अन्यथा नहीं है कि विश्व की आबादी प्रतिवर्ष लगभग अपने वजन के बराबर प्लास्टिक उत्पन्न करती है। प्रतिष्ठित अमेरिकी जर्नल 'साइंस' में प्रकाशित वर्ष 2015 के एक वैश्विक अध्ययन के मुताबिक दुनिया के 192 समुद्र तटीय देशों में तकरीबन 2 टन प्लास्टिक कचरा महासमुद्रों में प्रविष्ट हो गया है। 
 केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीबीसीपी) के आकलन अनुसार प्रतिवर्ष प्रत्येक भारतीय तकरीबन 8 किलोग्राम प्लास्टिक का उपयोग करता है। इसका निष्कर्ष यही हुआ कि भारत में प्रतिवर्ष तकरीबन 100 लाख टन प्लास्टिक का उपयोग किया जाता है। देश में प्रतिदिन 15,000 टन प्लास्टिक कचरा निकलता है जिसमें से सिर्फ 9,000 टन कचरा ही एकत्र और प्रोसेस किया जाता है, बाकी 6,000 टन प्लास्टिक कचरा नदी-नालों, गलियों-सड़कों और बाग-बगीचों सहित समुद्र तटीय क्षेत्रों में यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरा पड़ा रह जाता है, किंतु अब दोबारा इस्तेमाल योग्य नहीं बनाए जा सकने वाले थर्मोसेट प्लास्टिक के लिए गाइड लाइन बनाने का काम केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को दे दिया गया है, ये राहत की बात है। 

प्लास्टिक की थैलियां हमारे रोजमर्रा के जीवन की जरूरत और सुविधा दोनों ही बनती जा रही हैं। प्लास्टिक की थैलियां विक्रेताओं सहित उपभोक्ताओं तक में अति-लोकप्रिय हैं, क्योंकि ये थैलियां आकर्षक, सस्ती, मजबूत और हल्की होती हैं। इन्हें तह करके आसानी से जेब में रखा जा सकता है, लेकिन ये ही प्लास्टिक थैलियां अब जल, जमीन, जंगल के लिए हद दर्जे तक हानिकारक साबित हो रही हैं। जल में रहने वाले समुद्री जीवों, पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्यों और मवेशियों सहित वन्य जीवन को भी खतरनाक ढंग से खत्म करने के लिए ये प्रमुखत: जिम्मेदार बनती जा रही हैं। 

समुद्री प्रदूषण के कारण
समुद्री पर्यावरण विभिन्न स्रोतों और रूपों के माध्यम से दूषित और प्रदूषित हो जाता है। समुद्री प्रदूषण के प्रमुख स्रोत रसायन, ठोस अपशिष्ट, रेडियोधर्मी तत्वों का निर्वहन, औद्योगिक और कृषि प्रदूषण, मानव निर्मित तलछट, तेल फैलाने जैसे कई और कारक हैं। समुद्री प्रदूषण का अधिकांश भाग भूमि से आता है जो समुद्री प्रदूषण में 80 प्रतिशत का योगदान देता हैवायु प्रदूषण भी समुद्री जल में खेतों के कीटनाशक और धूल को पहुँचाता है। वायु और भूमि प्रदूषण बढ़ते समुद्री प्रदूषण में एक प्रमुख योगदान करते हैं जो न केवल जलीय पारिस्थितिकी में बाधा डालते हैं बल्कि भूमीय जीवन को भी प्रभावित करते हैं। गैर-बिंदु स्रोत जैसे हवा से बिखरे हुए मलबे, कृषि प्रवाह और धूल भी प्रदूषण के प्रमुख स्रोत बन गए हैं। इनके अलावा, भूमि अधिग्रहण, प्रत्यक्ष निर्वहन, वायुमंडलीय प्रदूषण, जहाजों के कारण प्रदूषण जैसे कारक और प्राकृतिक संसाधनों का गहरा समुद्र खनन भी प्रदूषण में भारी योगदान देते हैं।
 समूचे विश्व में प्रतिवर्ष तकरीबन 500 खरब प्लास्टिक थैलियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस तरह हम पाते हैं कि इस समय दुनिया में 1 मिनट में 1 अरब से भी ज्यादा ऐसी ही थैलियां इस्तेमाल की जा रही हैं जिनसे हमारा पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है।
 याद रखा जा सकता है कि प्लास्टिक थैलियों के विघटित होने में 1,000 बरस तक का कालखंड समर्पित हो जाता है, वहीं एक खतरनाक खबर यह भी है कि समूचे विश्व में सबसे ज्यादा प्लास्टिक का इस्तेमाल भारत करता है। 
 प्लास्टिक थैलियां खाने से प्रतिवर्ष तकरीबन 1 लाख से ज्यादा पशु-पक्षी मर जाते हैं। प्लास्टिक थैलों का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव भी यही है कि ये नॉन बायोडिग्रेडेबल हैं। यही नहीं, पॉलिथीन की ये थैलियां प्राकृतिक पर्यावरण को प्रदूषित करते हुए उसे भद्दा भी बना रही हैं। बाग-बगीचों, नदियों-तालाबों, सड़कों और समुद्री किनारों पर यहां-वहां बिखरी पड़ीं इन थैलियों से पर्यटन स्थल क्या गंदगी के अड्डे नहीं बन गए हैं
 हम अपनी दैनिक जरूरतों की पूर्ति जैसे उद्योग-धंधों, कल-कारखानों और परिवहन आदि के लिए अत्यंत ही तीव्र गति से गैर-नवीकरणीय संसाधनों का उपयोग कर रहे हैं, जो कि पेट्रोलियम पदार्थों पर आधारित हैं। जिस भी किसी दिन अगर पेट्रोलियम की आपूर्ति समाप्त हो गई तो फिर समझ लो कि उसी दिन ये दुनिया भी आधी ही रह जाएगी। मनुष्यों सहित समुद्री जीवों और वन्य जीवों को भी बचाना बेहद जरूरी है। कोई कारण नहीं है कि ऐसा किया जाना असंभव नहीं है। 
 प्लास्टिक के जन्मकाल से ही हम सुनते आ रहे हैं कि यह एक ऐसा पदार्थ है जिसे पूर्णत: समाप्त नहीं किया जा सकता है। इसे किसी एक आकार-प्रकार से किसी दूसरे आकार-प्रकार में बदल तो सकते हैं, लेकिन संपूर्णत: समाप्त नहीं कर सकते हैं। इसीलिए इसे दुनियाभर में खतरे की घंटी माना जाता है।

 किंतु स्टैंडफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अभी-अभी झींगुर प्रजाति का ही एक छोटा-सा ऐसा कीड़ा ढूंढ निकाला है, जो प्लास्टिक खाता है। अगर शोधकर्ता प्लास्टिक खाने वाले इस कीड़े की प्रजाति का विस्तार करने में सफल हो गए तो संभव है कि फिर प्लास्टिक से मुक्ति भी मिल जाएगी।
  गौरतलब है कि हाल ही में हमारे केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल 2016 अधिसूचित कर दिए हैं। केंद्र सरकार का कहना है कि ये नए नियम अगले 6 महीनों के भीतर प्रभावशील हो जाएंगे। नए नियम इतने सख्त हैं कि थैलियों की न्यूनतम मोटाई 40 से बढ़ाकर 50 माइक्रॉन कर दी गई है। इससे कम माइक्रॉन की थैलियां प्रतिबंधित कर दी गई हैं। इतना ही नहीं, पहले प्लास्टिक की इन थैलियों संबंधित प्रावधान सिर्फ शहरी क्षेत्रों में ही प्रभावशील किए जाते थे और ग्रामीण क्षेत्रों को इन नियमों से मुक्त रखा गया था किंतु नए नियम अब ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भी विस्तारित कर दिए गए हैं।

समुद्री प्रदूषण के प्रभाव


1. समुद्री जल में घुलित ऑक्सीजन की कमी :-
समुद्री जल में प्रदूषकों विशेषकर कार्बनिक प्रदूषकों की मात्रा बढ़ने के साथ ही जल में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा में कमी होती है। इसका कारण यही है कि जल में उपस्थित सूक्ष्म जीव एवं बैक्टीरिया द्वारा प्रदूषक के रूप में उपस्थित कार्बनिक पदार्थों का भक्षण करने के साथ ही उनकी संख्या में वृद्धि होने के फलस्वरूप घुलित ऑक्सीजन की खपत भी बढ़ती है और जल में घुलित ऑक्सीजन उसी तीव्रता से कम होती है। वास्तव में समुद्री जल में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ने से स्वाभाविक रूप से उसकी बीओडी बढ़ जाती है तथा बी.ओ.डी. बढ़ने से जल में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है।\
2. समुद्री जीवों पर प्रभाव :-
समुद्री जल में तेल के रिसाव से समुद्री जल सतह पर तेल की पतली फिल्म बन जाती है, जिससे वातावरण की वायु जल सतह के सीधे सम्पर्क में नहीं आ पाती, जिससे जल में घुलित ऑक्सीजन की सांद्रता कम हो जाती है। इसके अतिरिक्त रिसे हुए तेल को हटाने के लिये उपयोग किए जाने वाले डिटर्जेंट भी समुद्र की जलीय जीवन को अत्यधिक प्रभावित करते हैं। ये रासायनिक डिटर्जेंट अत्यंत विषैले किस्म के होते हैं।
इनके जलीय जीवों द्वारा ग्रहण किए जाने से ये रसायन खाद्य श्रृंखला में आ जाते हैं। साथ ही ये समुद्री सेडीमेंट में भी जमा हो जाते हैं। समुद्री जीवों की अनेक प्रजातियाँ इस प्रकार डिटर्जेंट का शिकार बन समाप्त होती जा रही हैं। डिटर्जेंट को खाने वाले समुद्री जीवों को ग्रहण करने पर मनुष्य के शरीर में भी ये हानिकारक रसायन पहुँच जाते हैं।
3. खाद्य श्रृंखला पर प्रभाव :-
समुद्री प्रदूषण के दौरान प्रदूषकों के समुद्री खाद्य श्रृंखला अथवा सतह के सेडीमेंट के साथ विभिन्न भौतिक रासायनिक क्रियाओं के माध्यम से ये उनमें पहुँच जाते हैं। प्रदूषकों के समुद्री जीवों द्वारा ग्रहण किये जाने अथवा समुद्री वनस्पति द्वारा इनके अवशोषण से इनके माध्यम से ये मनुष्य की खाद्य श्रृंखला में भी पहुँच जाते हैं। अनेक विषैले प्रदूषक समुद्री जीवों एवं वनस्पतियों की मृत्यु का कारण बनते हैं और इस प्रकार समुद्र के पारिस्थितिकीय तंत्र को प्रभावित करते हैं। समुद्री जैव-विविधता पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है।

4. अन्य प्रभाव :-
उपरोक्त के अतिरिक्त समुद्री प्रदूषण का दुष्प्रभाव समुद्रों पर आधारित जीव-जन्तुओं पर भी पड़ता है। अनेक समुद्री पक्षी जो समुद्रों पाये जाने वाले विभिन्न जीवों जैसे- मछलियों आदि पर निर्भर होते हैं, वे या तो खाद्य श्रृंखला में आने वाले प्रदूषकों के कारण मारे जाते हैं या समुद्री जल में पाये जाने वाले पॉलीथीन की थैलियों को निगलकर मर जाते हैं। कई बार पॉलीथीन की थैलियाँ उनकी गर्दन में फँस जाती हैं और दम घुटने के कारण उनकी मृत्यु हो जाती है।


समुद्री प्रदूषण का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव समुद्रों में पाये जाने वाले कोरल पर पड़ रहा है। समुद्री प्रदूषकों में पाये जाने वाले कीटनाशकों, खरपतवार नाशकों, पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बन, विषैली धातुओं एवं रेडियोएक्टिव प्रदूषकों के कारण संवेदनशील कोरल धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं।

सागर-संरक्षण के प्रयास

समुद्रों के बढ़ते प्रदूषण से विश्व के सभी देश चिन्तित हैं। सागर संरक्षण का मसला सर्वप्रथम जून, 1972 में स्टॉकहोम में सम्पन्न हुए 113 देशों के अन्तरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन में उठाया गया था। इसके फलस्वरूप एक नई अन्तरराष्ट्रीय संस्था- महासागर तथा तटवर्ती क्षेत्र कार्यक्रम केन्द्रयानि ओकापाकका उदय हुआ। यह संस्था पूरे विश्व में सागर संरक्षण के लिए कटिबद्ध है। इस संस्था ने सर्वप्रथम सर्वाधिक प्रदूषित भूमध्य सागर की सफाई का अभियान आरम्भ किया। सभी तटवर्ती देश इस बात पर सहमत हो गए हैं कि पारे और संखिया जैसे प्राणघाती जहर समुद्र में न फेंके जाएँ। अब तो ओकापाककी अनुमति से ही आवश्यकतानुसार खतरनाक और विषैले पदार्थ समुद्र तट से दूर गहराई में गिराए जा सकते हैं। डुबाने के पूर्व इन्हें ऐसा बना दिया जाता है कि ये सीधे पानी में मिलकर समुद्री जीवों को नुकसान न पहुँचा सकें।
तेलीय प्रदूषण की रोकथाम के लिए रीजनल ऑयल कंबेटिंग सेंटरनामक संस्था का निर्माण किया गया है। माल्टा के मैनोल द्वीप में स्थित इस संस्थान के दस्ते आग बुझाने वाली गाड़ियों की तरह तमाम साजो-सामान वाले जहाजों से लैस हैं। भूमध्य सागर में कहीं भी तेल फैल जाए तो आग बुझाने वाले संयन्त्र और तेल निगलने वाले उपकरण तुरन्त सक्रिय हो जाते हैं। संयुकत राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूनाइटेड नेशंस एन्वायरमेंट प्रोग्राम) के अधीन पहली बार 17 देशों में 120 प्रयोगशालाएँ बनाई गई जो सागर प्रदूषण की गतिविधियों को दर्ज करती रहती हैं। यह भी पता चला है कि भूमध्य सागर में बहाया गया 85 प्रतिशत मल-जल अनुपचारित होता है। नतीजतन 14 भूमध्य-सागरीय देशों के एक-चौथाई समुद्र-तट स्नान करने योग्य नहीं रहे हैं समुद्री प्रदूषण के कारण अनेक समुद्री जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है क्योंकि प्रदूषित जल में समुद्री जीव बेचैनी महसूस करते हैं और उनका जीवन दूभर हो जाता है।


सागर-संरक्षण के लिए सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं को मिलकर काम करना होगा। कैरीबियन सागर के 29 तटवर्ती देशों ने सागर की सफाई का संकल्प लिया है। निश्चय ही यह एक शुभ संकेत है। आज वैज्ञानिक समुद्री कछुओं, प्रवाल-शैलों, एवं दलदली जमीन में उगने वाली मैंग्रोव वनस्पतियों को बचाने के लिए सतत प्रयत्नशील हैं।

सागर संरक्षण की सबसे सुंदर मिसाल पेश की है फ्रांस ने, जहाँ समुद्रतट पर 43 निगरानी केन्द्र बनाए गए हैं। सागर की स्वच्छता के लिए 2400 लाख डालर की धनराशि भी इकट्ठी की गई है। फ्रांस में सागर संवेदना को जगाने का श्रेय कमांडर कोस्तू को है जिन्होंने दुनियाभर में सागर अभियान का श्रीगणेश किया। उन्होंने सागर की गहराईयों में पल रहे समुद्री जीव-जन्तुओं के प्रति जन-चेतना जागृत की है किन्तु कई मुद्दों पर आज भी अन्तरराष्ट्रीय विवाद जारी है। परमाणु कचरे को समुद्र में डुबाने का मामला ऐसा ही है। अमेरिका और जापान परमाणु कचरे को जलरोधी पेटियों में बंद कर तटवर्ती क्षेत्रों से दूर समुद्र में डुबाने के पक्षधर हैं। उनका मानना है कि यह कचरा समुद्र तल में अनंतकाल तक निरापद पड़ा रहेगा। किन्तु पर्यावरणविद इनसे होने वाले सम्भावित प्रदूषण से चिन्तित हैं। बहरहाल हमारे बहतर कल के लिए यह लाजिमी है कि समुद्र प्रदूषण-मुक्त हों और समुद्री जीव-जन्तु और उपयोगी समुद्री वनस्पतियाँ प्रदूषण की चपेट में न आएँ।

भारत का राष्ट्रीय महासागर विज्ञान संस्थान (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशनोग्राफी) भारतीय समुद्रों पर पैनी नजर रखता है। वैसे अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में तेल-मार्ग होने के कारण जगह-जगह तेल फैला है। तात्पर्य यह है कि दूसरे समुद्रों की तरह हमारे महासागर भी तेलाक्रांत हैं। समुद्री जीव-जन्तुओं, वनस्पतियों और खनिज पदार्थों से हमारा गहरा सरोकार है। अतः समुद्र को प्रदूषण-मुक्त रखना अत्यन्त आवश्यक है। इसी में समाज, राष्ट्र और विश्व का कल्याण निहित है।
 प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल 2016 लागू कर दिए जाने से पॉलिथीन की थैलियों, कैरी बैग आदि की कीमतें 20 फीसदी तक बढ़ जाएंगी। नए नियमों के अंतर्गत दुकानदारों, वेंडरों आदि को इनके इस्तेमाल से पूर्व स्थानीय निकायों में खुद को पंजीकृत कराना होगा जिसके लिए सालाना 48,000 अथवा मासिक 4,000 रुपए फीस चुकाना होगी। इसके बदले में दुकानकार अपने ग्राहकों से इसकी कीमत वसूल सकेंगे, साथ ही उन्हें अपनी दुकानों पर इस आशय का बोर्ड भी टांगना होगा कि उनके यहां उचित मूल्य पर प्रमाणित मात्रा के माइक्रॉन वाली प्लास्टिक थैलियां मिलती हैं।

 इसके अतिरिक्त निर्माता कंपनियों की यह जिम्मेदारी भी होगी कि उक्त कचरा एकत्र करते हुए अपना खुद का कचरा प्रबंधन तंत्र भी उसे स्थापित करना होगा। बहुत संभव है कि इन प्रावधानों का सख्ती से पालन करने पर सकारात्मक नतीजे निकलेंगे और महासमुद्रों को किसी हद तक प्लास्टिक कचरे से मुक्ति भी तभी मिलेगी।
(C) रवि रौशन कुमार 
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Monday, 25 March 2019

सौर सेल की क्षमता को बढ़ाया जा सकता है

 वैज्ञानिकों ने धातु का एक ऐसा सांचा तैयार किया है जो सौर सेल में कैद की गई सूरज की रोशनी की मात्रा को बढ़ा कर उसके ऊर्जा उत्पादन को लगभग एक तिहाई तक बढ़ा सकता है. शोधकर्ताओं ने कहा कि विकासशील देशों के साथ-साथ मूलभूत सुविधाओं से वंचित दूरस्थ क्षेत्रों के लिए कैद की गई सौर ऊर्जा इस साधारण, सस्ते एवं सरल तरीके से बढ़ाने में मदद मिल सकती है.

अमेरिका की कोलगेट यूनिवर्सिटी की सह-प्राध्यापक बेथ पार्क्स ने कहा, “युगांडा में 20 से 25 प्रतिशत लोगों के पास बिजली नहीं है.” पार्क्स ने कहा, “एक सौर सेल इतनी ऊर्जा देता है कि लाइट जल सके और सेलफोन एवं रेडियो चार्ज हो सकें. जीवन में सुधार का यह बेहद उम्दा रास्ता है.” सौर पैनल भले ही नवीकरणीय ऊर्जा का शुद्ध स्रोत हैं लेकिन आम तौर पर वह एक निश्चित सांचे में ढले होते हैं और दिन के कुछ खास घंटों में सूरज की तरफ सबसे बेहतर तरीके से मुड़े रहते हैं. 
पार्क्स ने युगांडा की मंबारारा यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के छात्रों के साथ काम कर धातु की एक ट्यूब के प्रयोग से एक डिजाइन तैयार किया जिसे स्थानीय वेल्डर आसानी से हासिल कर सकता है एवं फिट कर सकता है.
पार्क्स ने कहा, “हमने सस्ती वस्तुओं से एक सांचा तैयार किया है जो दिनभर सूरज की रोशनी की दिशा का पता लगाने में सौर पैनल के लिए मददगार साबित होंगे.” उन्होंने कहा, “इस तरीके से विकासशील देशों के घरों एवं छोटे कारोबारों के लिए सौर ऊर्जा अधिक सस्ती और सुलभ बन सकती है.” 

Friday, 15 March 2019

केरल की 'साइलेंट वैली' : विश्व धरोहर सूची में शामिल


'साइलेंट वैली' ये नाम अधिकतर लोगों ने शायद पहली बार सुना होगा. इसके नाम से ऐसा प्रतीत होता है मानो विदेश की कोई ख़ूबसूरत जगह हो, लेकिन आपको जानकारी दे दें कि ये ख़ूबसूरत वैली भारत के केरल राज्य में स्थित है.  
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केरल के पलक्कड़ ज़िले के पश्चिमी घाट पर स्थित 'साइलेंट वैली' अपनी जैव विविधता के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है. उत्तर में नीलगिरि की पहाडि़यां और दक्षिण में फैले मैदान के बीच होने के कारण ये घाटी 'साइलेंट वैली' के नाम से जानी जाती है. 
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नेचर लवर्स के लिए है 'वन इन ऑल' 
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अगर आप भी घूमने-फिरने के शौक़ीन हैं, तो 'साइलेंट वैली' एक ऐसी जगह है जहां जाकर आप वेकेशन का जमकर लुत्फ़ उठा सकते हैं. यहां की ख़ूबसूरती को निहारने के साथ-साथ आप यहां जंगल सफ़ारी का आनंद भी ले सकते हैं. 'साइलेंट वैली' अपनी ख़ूबसूरती के साथ-साथ कई तरह-तरह के पशु-पक्षियों और फूल-पौधों के लिए भी जानी जाती है. 
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'साइलेंट वैली' केरल के अंतिम वर्षा वनों के रूप में भी प्रसिद्ध है. इसलिए साल 1984 में इसे 'राष्ट्रीय उद्यान' का दर्जा हासिल हुआ. वहीं साल 2012 में यूनेस्को ने इसे 'विश्व धरोहर' की सूची में शामिल किया. 
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'साइलेंट वैली' में पाए जाते हैं जीव-जंतु 
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राष्ट्रीय उद्यान होने के कारण 'साइलेंट वैली' में कई तरह के जानवर जैसे हाथी, बाघ, सांभर, चीता वांडरू लंगूर व जंगली सुअर देखने को मिल जायेंगे. इसके साथ ही ये पूरी घाटी 1000 से भी ज़्यादा फूलों से भी महकती नज़र आती है. इसके साथ ही यहां करीब 110 किस्म के ऑर्किड, 200 किस्म की तितलियां व पक्षियों की करीब 170 प्रजातियां भी पाई जाती हैं.  
‘साइलेंट वैली’ भारत के सबसे लुप्तप्राय स्तनपायी प्राणियों में से एक वांडरू प्रजाति के लंगूर के लिए भी प्रसिद्ध है. 
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'साइलेंट वैली' की सबसे ख़ास बात है कि यहां दूसरे नेशनल पार्क जैसी भीड़ देखने को नहीं मिलती. यहां का शांत वातावरण नेचर लवर्स को ख़ूब भाता है. जीव-जंतुओं को देखने और उन्हें अपने कैमरे में क़ैद करने का इससे बेहतर मौका कहीं और नहीं मिल सकता. 
'साइलेंट वैली' की एक ख़ास बात ये भी है कि यहां पर कुंती नदी नीलगिरी पर्वत के 2000 मीटर की ऊंचाई से बहती है. जो इस घाटी से गुज़रती हुई मैदानों की ओर बहती है. इस नदी से क्रिस्टल क्लीयर पानी का अद्भुद नज़ारा भी देखने लायक होता है. 
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'साइलेंट वैली' का इतिहास 
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इतिहासकारों के मुताबिक़ अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां आकर रुके थे. स्थानीय लोग इसे सैरन्ध्रीवनम के नाम से भी जानते हैं. दरअसल, सैरन्ध्री द्रौपदी का ही एक नाम था. इस ख़ूबसूरत जगह की खोज साल 1847 में ब्रिटिश वनस्पतिशास्त्री रॉबर्ट वाइट ने की थी. सैरन्ध्री बोल पाना उनके लिए मुश्किल होता था इसलिए उन्होंने इसका नाम 'साइलेंट वैली' रखा. 
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कब और कैसे जाएं? 
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'साइलेंट वैली' पहुंचना बेहद आसान है. नज़दीकी हवाई अड्डा कोयंबटूर है. यहां से करीब डेढ़ घंटे में आप पलक्कड़ पहुंच सकते हैं. पलक्कड़ शहर में रेलवे स्टेशन भी है जो देश के रेल नेटवर्क से जुड़ा हुआ है. यहां की सड़क यातायात की सुविधा भी अच्छी है.

Wednesday, 13 March 2019

सिंगल टाइम ज़ोन के कारण भारत नुक़सान में

ब्रितानी शासनकाल ने भारत को कई चीज़ें दी हैं. इनमें से एक अहम चीज़ है पूरे देश का एक ही टाइमज़ोन में होना.
कई लोगों के अनुसार ये अनेकता में एकता का प्रतीक है. लेकिन ऐसा नहीं है कि सभी मानते हों कि भारतीय मानक समय यानी इंडियन स्टेंडर्ड टाइम एक अच्छी चीज़ है. पढ़िए क्यों.
पूर्व से पश्चिम तक भारत 3,000 किलोमीटर यानी 1,864 मील तक चौड़ा है. देशान्तर रेखा पर देखें तो ये कम से कम 30 डिग्री तक के इलाके में फैला है. सूर्य को आधार बना कर होने वाली समय की गणना के अनुसार इसका मतलब है कि एक छोर से दूसरे छोर तक समय का फर्क कम से कम दो घंटे का है.
इस फर्क का अंदाज़ा न्यू यॉर्क और यूटा के समय को देखने पर पता चलता है. अगर ये दोनों जगहें भारत में होतीं तो दोनों जगहों पर समय एक ही होता. लेकिन, भारत में इस छोटे से फर्क का असर लाखों लोंगों पर पड़ा है.
भारत के सूदूर पश्चिमी छोर के मुकाबले देश के पूर्व में सूर्योदय तकरीबन दो घंटे पहले होता है.
पूरे देश के लिए एक मानक समय की आलोचना करने वालों का कहना है कि देश के पूर्वोत्तर में सूर्य की रोशनी का पूरा इस्तेमाल करने के लिए ये ज़रूरी है कि भारत में दो मानक समय को स्वीकार किया जाए. पूर्व में सूर्य की रोशनी जल्दी पड़ती है और इस कारण वहां इसका इस्तेमाल पहले शुरु हो सकता है.
हमारे शरीर के भीतर एक घड़ी होती है जो एक नियत ताल पर चलती है, इसे सिर्काडियन रिदम कहते हैं. सूर्य का उदय होना और ढलना इस ताल को सीधे तौर पर प्रभावित करता है. जैसे-जैसे सांझ होने लगती है हमारे शरीर में नींद को प्रभावित करने वाला हॉर्मोन मेलाटोनिन बनता है, इस कारण व्यक्ति को नींद आने लगती है.
कॉर्नेल विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्री मौलिक जगनानी अपने शोध में कहते हैं कि पूरे देश में एक ही मानक समय होना का असर बच्चों की नींद की गुणवत्ता पर पड़ता है, ख़ास कर ग़रीब बच्चों की नींद पर. वो कहते हैं कि इसका सीधा असर उनकी शिक्षा पर पड़ता है.

ये कैसे हो सकता है?

चूंकि पूरे भारत में एक ही मानक समय को अपनाया गया है तो देश भर के स्कूल लगभग एक ही समय पर खुलते हैं. लेकिन, जिन जगहों पर सूर्य देर से अस्त होता है वहां बच्चे देर में सोने जाते हैं और इस कारण उन्हें जितनी नींद मिलनी चाहिए उससे कम नींद मिलती है.
अगर सूर्य के अस्त होने में एक घंटे की देरी है तो बच्चे को इस कारण आधे घंटी की नींद कम मिलती है.

इंडियन टाइम सर्वे और भारतीय डेमोग्राफिक एंड हेल्थ सर्वे के तहत जमा किए गए आंकड़ों का आकलन करने के बाद मौलिक जगनानी का कहना है कि जिन जगहों पर सूर्य देर में डूबता है वहां बच्चों को मिलने वाली शिक्षा का वक्त भी कम हो जाता है और ऐसी जगहों में बच्चों के प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल छोड़ने की आशंका अधिक रहती है.
उनका कहना है कि सूरज के देर में डूबने के कारण अधिकतर ग़रीब परिवारों के बच्चों को नींद कम मिलती है. ख़ास कर ऐसे परिवारों में जो मुश्किल आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं.
जगनानी कहते हैं, "इसका कारण ये हो सकता है कि गरीब परिवारों में बच्चों को शोर-शराबे, गर्मी, मच्छर, भीड़-भाड़ और मुश्किल शारीरिक हालातों में सोना पड़ता है. इसकी उम्मीद कम होती है कि गरीब परिवार बेहतर नींद के लिए खिड़कियों में पर्दे, अलग कमरे, घर के भीतर बिस्तर जैसी सुविधाओं में कम निवेश करेंगे और अधिकतर तो अनपी नींद के साथ भी समझौता कर लेते हैं."
"इसके साथ ही वो तनाव, नकारात्मक सोच और रोज़मर्रा की ज़रूरतों के बोझ के कारण मानसिक तनाव में भी होते हैं. इस कारण उनके फैसले भी प्रभावित हो सकते हैं."
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गोधूली बेला में घर लौटता एक व्यक्तिइमेज कॉपीरइट
AFP
जगनानी कहते हैं कि अगर सूर्य के अस्त होने के समय के अनुसार एक ज़िले की भी बात करें तो पूर्वी और पश्चिमी छोर की जगहों में बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता अलग-अलग पाई गई है.
वो कहते हैं कि शोध से पता चलता है कि सालाना औसत के अनुसार सूर्य के अस्त होने में एक घंटे की देरी का फर्क होने से बच्चे की पढ़ाई के 0.8 साल कम हो जाते हैं और ऐसी जगहों पर बच्चों के प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल छोड़ने की आशंका अधिक रहती है.
जगनानी कहते हैं कि अगर भारत एक ही मानक समय की जगह दो मानक समय की नीति अपना ले (पश्चिम भारत के लिए यूटीसी +5 घंटे और पूर्वी भारत के लिए यूटीसी +6 घंटे) तो भारत को सालाना तौर पर 452 करोड़ से अधिक की मानव पूंजी यानी जीडीपी का 0.2 फीसद का लाभ मिलेगा.
कोऑर्डिनेटेड यूनिवर्सल टाइम यानी यूटीसी का अर्थ ग्रीनविच मीन टाइम से ही होता है लेकिन इसे एक एटॉमिक घड़ी की मदद से आंका जाता है और ये अधिक सही होता है.

दो मानक समय ज़ोन को अपनाने को लेकर भारत में लंबी बहस चली है. उत्तर-पूर्वी असम में चाय बागानों में काम करने वाले मज़दूर लंबे वक्त से अपनी घड़ियों में भारतीय मानक समय से एक घंटे पहले का वक़्त रखते हैं. ये एक तरह से एक दूसरे मानक समय को अपनाने जैसा है.
1980 के दशक के आख़िर में एक नामी ऊर्जा संस्थान के शोधकर्ताओं के एक दल ने बिजली बचाने के लिए एक मानक समय की व्यवस्था सुझाई थी. 2002 में एक सरकारी पैनल ने इसमें मुश्किलों का हवाला देते हुए इस तरह के एक प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया था.
कुछ विशेषत्ज्ञों को लगता है कि इसमें ट्रेनों के एक्सीडेंट का ख़तरा अधिक है क्योंकि अलग मानक समय ज़ोन में प्रवेश करते ही उनका समय बदलना ज़रूरी होगा.
हालांकि, बीते साल आधिकारिक भारतीय टाइमकीपर्स ने खुद ही दो मानक समय ज़ोनका सुझाव दिया था- एक मानक समय देश के आठ उत्तर पूर्वी राज्यों के लिए जिनमें सात बहनें शामिल हैं और दूसरा शेष भारत के लिए. इन दोनों मानक समय ज़ोन में एक घंटे का फर्क सुझाया गया था.
नेशनव फिज़िकल लेबोरेटरी के शोधकर्ताओं के अनुसार एक ही मानक समय ज़ोन का होना "जीवन को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है" क्योंकि आधिकारिक तौर पर काम करने के समय से काफी जल्दी सूर्योदय और सूर्यास्त होता है.
जल्दी सूर्योदय होने के कारण दफ्तरों में काम के घंटों का नुकसान होता है क्योंकि स्कूल और कॉलेज सूरज की रोशनी का सही लाभ लेने के लिए "देरी से" खुलते हैं. सर्दी के दिनों में हालात और बुरे हो जाते हैं क्योंकि सूरज जल्दी ढलता है और "काम बंद ना हो" इसलिए बिजली की खपत भी बढ़ जाती है.
इसका सार यही है कि नींद का सीधा नाता व्यक्ति की उत्पादकता से है और ग़लत समय ज़ोन में होने का कारण लोगों की, ख़ास कर ग़रीब बच्चों की ज़िंदगी प्रभावित हो सकती है.

वायु प्रदूषण से हर साल 70 लाख लोगों की मौत

घर के अंदर की प्रदूषित हवा और बाहर के वायु प्रदूषण के कारण हर साल करीब 70 लाख लोगों की मौत हो रही है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार और पर्यावरण के जानकारों ने इस आंकड़े की पुष्टि की है। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ ने यह भी कहा कि प्रदूषित वायु में सांस लेने के कारण गंभीर बीमारियां हो रही हैं।

प्रमुख बिन्दू :-
  • यूएन के विशेषज्ञ डेविड बोयड ने कहा, 6 अरब लोग नियमित रूप से इतनी प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं
  • पर्यावरण के जानकारों का कहना है कि हर साल इससे 70 लाख लोग मर रहे हैं
  • प्रदूषित हवा के कारण मरनेवालों में हर साल लगभग 6 लाख बच्चे होते हैं
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संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण एवं मानवाधिकारों के जानकार ने कहा है कि घर के अंदर और बाहर होने वाले वायु प्रदूषणके कारण हर साल करीब 70 लाख लोगों की मौत समय से पहले हो जाती है। इनमें 6 लाख बच्चे शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ डेविड बोयड ने कहा कि करीब छह अरब लोग नियमित रूप से इतनी प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं कि इससे उनका जीवन और स्वास्थ्य जोखिम में घिरा रहता है।

र्यावरण और मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक ने सोमवार को मानवाधिकार परिषद से कहा, 'इसके बावजूद इस महामारी पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। ये मौतें अन्य आपदाओं या महामारियों से होने वाली मौतों की तरह नाटकीय नहीं हैं। हर घंटे 800 लोग मर रहे हैं जिनमें से कई तकलीफ झेलने के कई साल बाद मर रहे हैं, कैंसर से, सांस संबंधी बीमारी से या दिल की बीमारी से जो प्रत्यक्ष तौर पर प्रदूषित हवा में सांस लेने के कारण होती है।' 

कनाडा की ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी में असोसिएट प्रफेसर बोयड ने कहा कि स्वच्छ हवा सुनिश्चित नहीं कर पाना स्वस्थ पर्यावरण के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि यह वे अधिकार हैं जिन्हें 155 देशों ने कानूनी मान्यता दी है और इसे वैश्विक मान्यता प्राप्त होनी चाहिए। उन्होंने 7 अहम कदमों की पहचान की जिसे स्वच्छ हवा सुनिश्चित करने के लिए देशों को उठाना चाहिए। 

इनमें वायु गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य पर उसके प्रभावों की निगरानी, वायु प्रदूषण के स्रोतों का आकलन और जन स्वास्थ्य परामर्शों समेत अन्य सूचनाओं को सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध कराना शामिल है। बोयड ने कहा, ‘अच्छे चलन के कई उदाहरण हैं जैसे भारत और इंडोनेशिया के कार्यक्रम जिन्होंने कई गरीब परिवारों को खाना पकाने की स्वच्छ तकनीकों की तरफ मोड़ा है। ऐसे देश जो कोयले से चलने वाले ऊर्जा संयंत्रों के इस्तेमाल को खत्म कर रहे हैं।'


#रवि रौशन कुमार 

Monday, 11 March 2019

वैज्ञानिकों द्वारा 130 वर्ष बाद किलोग्राम की परिभाषा बदले जाने की घोषणा



वैज्ञानिकों ने 16 नवंबर 2018 को सर्वसम्मति से किलोग्राम की परिभाषा बदलने का निर्णय लिया है. इस नई परिभाषा के परिणामस्वरूप पेरिस में 1889 में अपनाए गए  प्लैटिनम अलॉय सिलिंडर का उपयोग बंद हो जाएगा.

प्लैंक कांस्टेंट द्वारा पुनर्परिभाषित नए सिस्टम में द्रव्यमान की यूनिट इलेक्ट्रिकल फोर्स के ज़रिए निर्धारित होती है. ये नए बदलाव 20 मई 2019 से वर्ल्ड मेट्रोलोजी डे पर प्रभाव में आएंगे.

स्मरणीय तथ्य

 वैज्ञानिकों ने किलोग्राम की परिभाषा बदल दी है. नई परिभाषा को 50 से ज़्यादा देशों ने सर्वसम्मति से मंजूरी भी दे दी है.

 वर्तमान में इसे प्लेटिनम से बनी एक सिल के वज़न से परिभाषित किया जाता है जिसे ली ग्रैंड के (Le Grand K) कहा जाता है. ऐसी एक सिल पश्चिमी पेरिस में इंटरनेशनल ब्यूरो ऑफ़ वेट्स एंड मेज़र्स (बीआईपीएम) के पास साल 1889 से बंद है.

 वैज्ञानिकों का पक्ष था कि किलोग्राम को यांत्रिक और विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा के आधार पर परिभाषित किया जाए.

 भविष्य में किलोग्राम को किब्बल या वाट बैलेंस का उपयोग करके मापा जाएगा. यह एक ऐसा उपकरण है जो यांत्रिक और विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा का उपयोग करके सटीक गणना करता है.

ऐसा होने पर किलोग्राम की परिभाषा न बदली जा सकेगी और न ही इसे कोई नुकसान पहुँचाया जा सकेगा. यह न केवल फ्रांस में बल्कि दुनिया में कहीं भी वैज्ञानिकों को एक किलो का सटीक माप उपलब्ध करवाएगा.

अंतरराष्ट्रीय मानक प्रणाली में किलो

अंतरराष्ट्रीय मानक प्रणाली में किलो सात बेसिक यूनिट्स में से एक है. उनमें से चार हैं- किलो, एंपियर (विद्युत प्रवाह), केल्विन (ताप) और मोल (पार्टिकल नंबर). किलोग्राम अंतिम एसआई बेस यूनिट है जो अभी तक एक फ़िज़ीकल ऑब्ज़ेक्ट द्वारा परिभाषित है.



क्यों किया गया परिवर्तन?

19वीं शताब्दी में फ्रांस के अंतरराष्ट्रीय ब्यूरो ऑफ वेट एंड मेजर्स (BIPM) के दफ्तर में एक कांच के कटोरे में प्लेटिनम इरीडियम धातु (Le Grand K) का एक टुकड़ा रखा गया था. इसका आकार सिलिंडर के जैसा है. ली ग्रैंड के' लंदन में निर्मित 90 प्रतिशत प्लेटिनम और दस प्रतिशत इरिडियम से बना 4 सेंटीमीटर का एक सिलेंडर है, जो पश्चिमी पेरिस के सीमांत सेवरे में इंटरनेश्नल ब्यूरो ऑफ़ वेट्स एंड मेजर्स (बीआईपीएम) के वॉल्ट में साल 1889 से बंद है.

वैज्ञानिकों का मानना है कि फ़िज़ीकल ऑब्ज़ेक्ट आसानी से परमाणु को खो सकते हैं या हवा से अणुओं को अवशोषित कर सकते हैं, इसी कारण इसकी मात्रा माइक्रोग्राम में दसियों बार बदली गई थी. इसका अर्थ यह हुआ कि किलोग्राम और स्तर मापने के लिए दुनिया भर में प्रोटोटाइप का उपयोग किया जाता है. सामान्य जीवन में इसे मापा नहीं जा सकता लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए यह समस्या पैदा कर सकता है.



संकलन : श्री विकास मिश्र, प्रखंड-जाले, दरभंगा.
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